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संघर्ष ही सफलता की पहली सीढ़ी है।

Not a single woman MP from a major state like Kerala; ADR report raises questions about the intent of political parties.

Not a single woman MP from a major state like Kerala; ADR report raises questions about the intent of political parties.

Percentage of women MPs in Parliament : केरल जैसे बड़े राज्य से एक भी महिला सांसद नहीं; राजनीतिक दलों की नीयत पर एडीआर की रिपोर्ट ने उठाए सवाल

Percentage of women MPs in Parliament : केरल जैसे बड़े राज्य से एक भी महिला सांसद नहीं— क्या देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी केवल नारों तक सीमित है? ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) की ताजा रिपोर्ट ने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की उपस्थिति अभी भी मात्र 10 प्रतिशत है। यह तब है जब देश में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ 2023 पारित हो चुका है, लेकिन जमीन पर स्थिति अब भी बदतर है।

Not a single woman MP from a major state like Kerala; ADR report raises questions about the intent of political parties.
Not a single woman MP from a major state like Kerala; ADR report raises questions about the intent of political parties.

चुनावी टिकटों में उपेक्षा की कड़वी सच्चाई

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एडीआर और ‘नेशनल इलेक्शन वॉच’ द्वारा किए गए व्यापक विश्लेषण में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर के चुनावों में खड़े होने वाले कुल उम्मीदवारों में से महज 10 प्रतिशत ही महिलाएं रही हैं। स्थिति इतनी गंभीर है कि कई राज्यों में आज भी महिलाओं को चुनावी मैदान में उतारने से परहेज किया जा रहा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो:

  • देशभर के कुल 4,666 सांसदों/विधायकों में से सिर्फ 464 महिलाएं हैं।
  • लोकसभा चुनाव के दौरान कई निर्वाचन क्षेत्रों में शून्य महिला उम्मीदवार मैदान में थे।
  • राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों के दावों के बावजूद, टिकट वितरण में पुरुष प्रधानता हावी है।

आम महिलाओं की नजर में क्या है भविष्य?

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क्षेत्रीय स्तर पर देखें तो स्थिति और भी चिंताजनक है। स्थानीय निकाय चुनावों में तो महिलाएं बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं, लेकिन मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश करने के लिए उन्हें अब भी कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है। क्या जनगणना के बाद वाकई स्थितियां बदलेंगी, या यह सिर्फ एक और लंबा इंतजार साबित होगा? आम जनता का मानना है कि केवल आरक्षण का बिल लाने से नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों की नियत बदलने से ही ‘आधी आबादी’ को उनका हक मिलेगा।

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