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कोर्टरूम में गूंजती आवाज, सड़क पर बरसता एक्शन

ट्रेलर की शुरुआत शांत माहौल से होती है। फिर अचानक स्क्रीन पर तनाव फूट पड़ता है। कोर्टरूम में फाइलें गिरती हैं, बाहर भीड़ नारे लगाती है और सूर्या की आंखों में गुस्सा साफ दिखता है। एक सीन में वह अकेले दर्जनों लोगों के बीच खड़े नजर आते हैं। कैमरा धीरे-धीरे उनके चेहरे के करीब आता है। फिर एक मुक्का। स्क्रीन हिलती महसूस होती है।

फिल्म में RJ बालाजी सिर्फ निर्देशक नहीं हैं। वह कहानी के मुख्य विरोधी किरदार में भी नजर आ रहे हैं। उनका शांत चेहरा और धीमी आवाज ट्रेलर में अलग डर पैदा करती है। दूसरी तरफ तृषा कृष्णन भावनात्मक परत जोड़ती हैं। उनका किरदार सिर्फ सजावट नहीं लगता। कई दृश्यों में वह सीधे सिस्टम से सवाल करती दिखती हैं।

सूर्या का बदला हुआ अंदाज

पिछली फिल्मों की तुलना में इस बार सूर्या ज्यादा रॉ और आक्रामक दिखाई दे रहे हैं। उनका लुक साधारण है, लेकिन स्क्रीन प्रेजेंस भारी पड़ती है। ट्रेलर में एक डायलॉग खास ध्यान खींचता है — “जब कानून सो जाता है, तब सड़कों पर फैसला होता है।” यही लाइन पूरे ट्रेलर का टोन तय कर देती है।mट्रेलर देखते वक्त ऐसा महसूस होता है जैसे हर सीन में दबाव बढ़ रहा हो। बैकग्राउंड स्कोर लगातार धड़कन तेज करता है। थिएटर में बैठे फैंस की सीटियां और तालियां सोशल मीडिया क्लिप्स में साफ सुनाई दे रही हैं। कई दर्शकों ने इसे सूर्या की सबसे इंटेंस फिल्मों में से एक बताया है।

मानवीय एंगल भी छोड़ता है असर

एक छोटा सीन खास असर छोड़ता है। बारिश में भीगी सड़क पर खड़ी एक बुजुर्ग महिला कैमरे की तरफ देखती है, जबकि पीछे पुलिस बैरिकेड्स लगे हैं। बिना ज्यादा संवाद के भी वह दृश्य कहानी का दर्द दिखा देता है। यही वजह है कि ट्रेलर सिर्फ एक्शन तक सीमित नहीं लगता।

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