नई दिल्ली। चुनावी वादों में फ्री राशन, महिलाओं को नकद सहायता और अन्य ‘मुफ्त योजनाएं’ (Freebies) अब राज्यों की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ने लगी हैं। कई राज्यों में इन योजनाओं का खर्च कुल राजस्व का 30 से 40% तक पहुंच गया है, जिससे बजट संतुलन बिगड़ रहा है और वित्तीय संकट गहराता जा रहा है।
राज्यों पर बढ़ रहा आर्थिक दबाव
विशेषज्ञों के अनुसार, राज्यों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे इन योजनाओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं जुटा पा रहे हैं। नतीजतन, विकास कार्यों और बुनियादी सुविधाओं पर खर्च कम करना पड़ रहा है।
हिमाचल में नकदी संकट, वेतन-पेंशन तक टली
छोटे राज्य हिमाचल प्रदेश में स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर बताई जा रही है। यहां नकदी संकट इतना बढ़ गया कि
- मुख्यमंत्री, मंत्री और विधायकों के वेतन
- अफसरों की पेंशन
तक टालनी पड़ी।
यह स्थिति बताती है कि मुफ्त योजनाओं का बोझ किस हद तक बढ़ चुका है।
तेलंगाना, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र का हाल
- तेलंगाना: चुनावी घोषणाओं को पूरा करने के लिए हर साल करीब 1 लाख करोड़ रुपए की जरूरत, लेकिन बजट की कमी से कई योजनाएं अधर में।
- मध्यप्रदेश: लाड़ली बहना योजना समेत अन्य योजनाओं के कारण कर्ज GSDP के 27% से बढ़कर 32% तक पहुंच गया।
- महाराष्ट्र: लाडकी बहिन योजना के दबाव में सरकार को त्योहारों में मिलने वाली राशन किट योजना बंद करनी पड़ी।
पंजाब और राजस्थान में भी कटौती
- पंजाब: कुल राजस्व करीब 1.26 लाख करोड़, जबकि योजनाओं पर खर्च लगभग 2.6 लाख करोड़। वेतन, पेंशन और ब्याज पर ही 90 हजार करोड़ खर्च।
- राजस्थान: बजट संतुलन के लिए सड़क और पानी जैसी बुनियादी योजनाओं का खर्च 28% तक घटाया गया, साथ ही मुफ्त सेनेटरी पैड योजना भी बंद करनी पड़ी।
संकट की असली वजह: आय कम, खर्च ज्यादा
विशेषज्ञ मानते हैं कि समस्या की जड़ है—
- चुनावी वादों में बढ़ती मुफ्त योजनाएं
- सीमित राजस्व आय
- कर्ज पर बढ़ती निर्भरता
इस असंतुलन से राज्यों की वित्तीय स्थिति लगातार कमजोर हो रही है।
एक्सपर्ट की चेतावनी
“अगर कैश ट्रांसफर जैसी चुनावी योजनाएं जारी रहीं, तो देश की अर्थव्यवस्था भले स्थिर रहे, लेकिन राज्य डिफॉल्ट की स्थिति में पहुंच सकते हैं।”
— डॉ. अमरजीत सिंह सेठी, एडिटर, इंडियन एसोसिएशन फॉर रिसर्च इन नेशनल इनकम एंड वेल्थ
क्या है आगे का रास्ता?
विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकारों को—
- मुफ्त योजनाओं की समीक्षा करनी होगी
- राजस्व बढ़ाने के नए स्रोत तलाशने होंगे
- और विकास कार्यों के साथ संतुलन बनाना होगा

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