श्रोत : आईएएनएस, नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को एक जनहित याचिका (PIL) पर नोटिस जारी किया है। इस याचिका में मांग की गई है कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में भी ‘क्रीमी लेयर’ सिद्धांत को लागू किया जाना चाहिए।
संवैधानिक आधार: यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई है, जिस पर कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा है।
सुनवाई की पीठ: इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष हुई।
अधिवक्ता का तर्क: अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने कोर्ट में दलील दी कि यदि किसी एससी/एसटी परिवार का कोई सदस्य पहले से ही किसी संवैधानिक पद या वरिष्ठ सरकारी पद पर है, तो ऐसे व्यक्ति के बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
उद्देश्य: याचिकाकर्ता का तर्क है कि इन श्रेणियों के भीतर जो परिवार पहले से ही संपन्न और उन्नत हो चुके हैं, उन्हें निरंतर आरक्षण देना ‘सकारात्मक कार्रवाई’ (Affirmative Action) के मूल उद्देश्य को विफल करता है। आरक्षण का लाभ उन लोगों तक पहुँचना चाहिए जो वास्तव में पिछड़े और जरूरतमंद हैं।
इसका अर्थ क्या है?
वर्तमान में, ‘क्रीमी लेयर’ का सिद्धांत मुख्य रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण पर लागू होता है, जहाँ एक निश्चित आय सीमा से अधिक वाले परिवारों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। यदि यह एससी/एसटी पर भी लागू होता है, तो संपन्न दलित और आदिवासी परिवारों को आरक्षण से बाहर किया जा सकता है ताकि लाभ नीचे के स्तर तक पहुँच सके।

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