“ईश्वर और रचना में भेद कैसा?”: जस्टिस अमानुल्लाह की टिप्पणी
सुनवाई के छठे दिन जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह (Justice Ahsanuddin Amanullah) ने गहरी टिप्पणी की. उन्होंने पूछा कि जब एक भक्त पूरी श्रद्धा और साफ दिल के साथ मंदिर जाता है, तो उसे यह क्यों कहा जाता है कि वह अपनी स्थिति या जन्म के कारण मूर्ति को नहीं छू सकता? जस्टिस अमानुल्लाह ने ज़ोर देकर कहा कि बनाने वाले (ईश्वर) और उसकी रचना (इंसान) के बीच ऐसा अंतर नहीं होना चाहिए. यह बहस सिर्फ़ सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के हर नागरिक के ‘समानता के अधिकार’ की परीक्षा है |
दूसरी ओर, मंदिर के मुख्य पुजारी और ‘सबरीमाला आचार संरक्षण समिति’ की ओर से वरिष्ठ वकील वी. गिरी (V. Giri) ने दलील दी. उन्होंने कहा कि भगवान अयप्पा का स्वरूप ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ (Perennial Celibate) का है. वकील ने तर्क दिया कि मंदिर की परंपराएं और पूजा का तरीका देवता की विशेषताओं के अनुरूप ही होना चाहिए. उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर कोई भक्त मंदिर जाता है, तो उसे उस देवता के चरित्र और वहां की अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं (Essential Religious Practices) का सम्मान करना होगा |
कोर्ट रूम में तनाव तब और बढ़ गया जब जस्टिस बी.वी. नागरत्ना (Justice B.V. Nagarathna) ने पूछा कि क्या केवल कुछ योग्यताओं वाले व्यक्तियों का ही अनुष्ठान करना छुआछूत की श्रेणी में आएगा? उन्होंने संकेत दिया कि मंदिर की विशिष्ट परंपराओं का पालन करना हमेशा भेदभाव नहीं होता. यह बहस सुरक्षा और धर्म के बीच चल रही वैचारिक लड़ाई को प्लेऑफ की दौड़ जैसा महत्वपूर्ण बना देती है |

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