रायपुर: केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में हुई कैबिनेट बैठक में राष्ट्रीय जनगणना को जातिगत आधार पर कराने के फैसले का ओबीसी महासभा ने स्वागत किया है। महासभा के प्रदेश अध्यक्ष राधेश्याम साहू ने इसे सामाजिक न्याय और समतामूलक समाज की दिशा में ऐतिहासिक पहल बताया है। उन्होंने कहा कि 1931 के बाद पहली बार आजाद भारत में ओबीसी वर्ग की जातिगत जनगणना की जा रही है, जिससे बहुसंख्यक समुदाय की वास्तविक जनसंख्या, सामाजिक, शैक्षिक एवं आर्थिक स्थिति का आकलन संभव होगा।
ओबीसी महासभा के पदाधिकारियों ने संयुक्त रूप से कहा कि संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत गठित आयोगों—काका कालेलकर, मंडल आयोग और मध्यप्रदेश का रामजी महाजन आयोग—ने भी ओबीसी की जनगणना की अनुशंसा की थी। 2011 की जनगणना में प्रयास के बावजूद ओबीसी से संबंधित आंकड़े अधिकृत रूप से प्रकाशित नहीं किए गए थे।
महासभा का कहना है कि उन्होंने लंबे समय से इस विषय पर सरकार को ज्ञापन सौंपते हुए ओबीसी वर्ग के लिए अलग कॉलम की मांग की थी, जो अब जाकर पूरी हुई है। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति और जनजाति की जनगणना हर दस वर्षों में होती है, लेकिन ओबीसी वर्ग इससे वंचित रहा। अब यह फैसला सामाजिक समावेशन की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
राधेश्याम साहू ने बताया कि जनगणना में ओबीसी की गणना से न केवल जनसंख्या का सही आंकलन होगा, बल्कि इससे शिक्षा, रोजगार और योजनाओं में उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी। उन्होंने इसे ओबीसी महासभा के संघर्ष और लोकतांत्रिक दबाव का परिणाम बताते हुए केंद्र सरकार का आभार व्यक्त किया।
ओबीसी महासभा ने सभी वर्गों से इस ऐतिहासिक कदम को सहयोग देने की अपील की है ताकि देश में समानता और न्याय की नींव और मजबूत हो सके।

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