नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस द्वारा आरोपियों के फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल करने के मामले में कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने इसे निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के लिए गंभीर खतरा बताते हुए कहा कि जांच एजेंसी का काम पूरी तरह निष्पक्ष रहना है, न कि किसी पक्ष विशेष के समर्थन में खड़ा होना।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई आरोपी की गरिमा को ठेस पहुंचाती है और न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती है।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि पुलिसकर्मियों द्वारा आरोपियों को हथकड़ी लगी या अपमानजनक स्थिति में दिखाते हुए फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करना न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करता है। इससे आम जनता के मन में पहले से ही आरोपी के खिलाफ पूर्वाग्रह (Bias) बन जाता है, जो निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत के खिलाफ है।
जांच एजेंसी को रहना होगा निष्पक्ष
अदालत ने दोहराया कि जांच एजेंसी की भूमिका पूरी तरह न्यूट्रल (Neutral) होनी चाहिए। वह न तो पीड़ित के पक्ष में होती है और न ही आरोपी के खिलाफ, बल्कि केवल तथ्यों के आधार पर जांच करना उसका कर्तव्य है।
‘डिजिटल अरेस्ट’ पर चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर आरोपियों के वीडियो वायरल करने की प्रवृत्ति को ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) जैसा बताया। कोर्ट के अनुसार, यह एक खतरनाक ट्रेंड है, जिससे लोगों के मन में आरोपी के प्रति नकारात्मक धारणा पहले ही बन जाती है।
प्रेस और सोशल मीडिया की भूमिका पर सवाल
अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि आज के दौर में हर व्यक्ति खुद को मीडिया समझने लगा है और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग बढ़ता जा रहा है। कोर्ट ने प्रेस और पुलिस के बीच संभावित मिलीभगत पर भी सवाल उठाए।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन प्लेटफॉर्म्स को “ब्लैकमेलर्स” के समान बताया।
कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाकर्ता को जनहित याचिका (PIL) को व्यापक दायरे के साथ दोबारा दाखिल करने की अनुमति दी है।

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