भोपाल, मध्य प्रदेश: बीमा कंपनियों के लिए एक बड़ा झटका देते हुए, भोपाल के जिला उपभोक्ता आयोग ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी बेचते समय अगर कंपनियां ग्राहक की आदतों (जैसे शराब, सिगरेट का सेवन) की ठीक से जांच नहीं करती हैं, तो बाद में केवल इन्हीं बहानों पर बीमा क्लेम देने से इनकार नहीं कर सकतीं।
यह मामला नरेला, सकरी निवासी जन्मेश चतुर्वेदी से संबंधित है। उन्होंने केयर हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी से 38,191 रुपये का प्रीमियम चुकाकर स्वास्थ्य बीमा लिया था। 19 जून, 2025 की रात अचानक छाती में दर्द और सांस लेने में तकलीफ होने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। उनकी कोरोनरी आर्टरी एंजियोग्राफी की गई और इलाज में कुल 2,41,805 रुपये का खर्च आया।
हालांकि, कंपनी ने यह कहते हुए क्लेम रद्द कर दिया कि जन्मेश चतुर्वेदी शराब, सिगरेट और गुटखा का सेवन करते हैं, जिसकी जानकारी बीमा पॉलिसी लेते समय नहीं दी गई थी। कंपनी ने दावा किया कि उनके इलाज की पर्ची पर लगी मेडिकल रिपोर्ट में एक कॉलम में ‘सही’ (टिक) का निशान था, जो उनके सेवन की पुष्टि करता था, जबकि जन्मेश चतुर्वेदी ने इस बात से इनकार किया।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, आयोग के अध्यक्ष योगेश दत्त शुक्ला और सदस्य डॉ. प्रतिमा पांडे की बेंच ने टिप्पणी की कि उपभोक्ता के दस्तावेजों पर ठीक से विचार किए बिना ही बीमा कंपनी द्वारा बहाना बनाकर इलाज का क्लेम रद्द करना सेवा में कमी है।
आयोग ने फैसला सुनाया कि बीमा कंपनी को जन्मेश चतुर्वेदी को 2,41,805 रुपये दो महीने के भीतर 9% ब्याज के साथ चुकाने होंगे। इसके अतिरिक्त, कंपनी को 5,000 रुपये मानसिक क्षतिपूर्ति और 3,000 रुपये वाद व्यय के रूप में भी देने का निर्देश दिया गया।
आपको बता दें कि बीमा कंपनियां पॉलिसी बेचते समय उपभोक्ताओं से एक फॉर्म में यह जानकारी भरवाती हैं कि वे शराब, सिगरेट या तंबाकू आदि का सेवन करते हैं या नहीं, और उनकी मेडिकल हिस्ट्री क्या रही है। यदि ये आदतें पाई जाती हैं, तो उनके लिए बीमा प्रीमियम दरें सामान्य से अधिक होती हैं। इस फैसले से उन उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिलेगी जिन्हें बीमा कंपनियों द्वारा अनावश्यक रूप से क्लेम देने से इनकार किया जाता रहा है।



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