- रिपोर्ट पर पलटवार: चीन ने अमेरिकी खुफिया विभाग की उस रिपोर्ट को खारिज किया जिसमें ताइवान पर हमले का जिक्र था।
- हौवा बंद करो: बीजिंग ने वाशिंगटन को ‘चाइना थ्रेट’ (चीन का खतरा) को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने पर सख्त चेतावनी दी।
- ईरान मुद्दा: चीन ने ईरान में किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई को तुरंत रोकने की अपील की।
China Warning to US , बीजिंग/नई दिल्ली — चीन और अमेरिका के बीच जुबानी जंग एक बार फिर तेज हो गई है। बीजिंग ने वाशिंगटन को सीधी नसीहत दी है कि वह ‘चीन के खतरे’ की फर्जी कहानी गढ़ना बंद करे। यह तीखा पलटवार अमेरिकी खुफिया विभाग की उस लेटेस्ट रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें अगले साल ताइवान पर चीनी हमले की संभावनाओं का विश्लेषण किया गया था। चीन ने साफ किया कि अमेरिका अपनी घरेलू राजनीति के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर डर पैदा कर रहा है।
इंटेलिजेंस रिपोर्ट और ताइवान का गणित
अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि चीन अगले साल (2027) तक ताइवान पर हमला करने की स्थिति में नहीं होगा। हालांकि, बीजिंग ने इस पूरी रिपोर्ट को ही प्रोपेगेंडा करार दिया है। चीन का कहना है कि अमेरिका एक तरफ तो शांति की बात करता है और दूसरी तरफ ताइवान को हथियारों की सप्लाई कर तनाव बढ़ा रहा है।
- मुख्य विवाद: ताइवान जलडमरूमध्य में अमेरिकी नौसेना की बढ़ती मौजूदगी।
- ईरान फैक्टर: चीन ने अमेरिका को ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य दुस्साहस से बचने की सलाह दी है।
- कूटनीतिक रुख: चीन का मानना है कि अमेरिका ‘जीरो-सम’ गेम खेल रहा है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक है।
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि अमेरिका को दूसरों पर उंगली उठाने के बजाय अपने सैन्य बजट और विदेशों में हस्तक्षेप पर ध्यान देना चाहिए।
“अमेरिका को काल्पनिक ‘चीन खतरे’ की बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना बंद करना चाहिए। यह न केवल द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता को भी खतरे में डालता है। ताइवान हमारा आंतरिक मुद्दा है और ईरान में शांति बहाली के लिए सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि बातचीत ही एकमात्र रास्ता है।”
— विदेश मंत्रालय प्रवक्ता, चीन
चीन की इस सख्ती ने साफ कर दिया है कि वह अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता के मुद्दे पर पीछे नहीं हटने वाला। ताइवान पर अमेरिका के रक्षा वादे और चीन के ‘वन चाइना पॉलिसी’ के बीच बढ़ता टकराव इस साल की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक चुनौती है।

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