सजा कम करने के पीछे ‘सुधारात्मक न्याय’ का तर्क
अदालत ने पाया कि दोषी पिछले 10 साल से जेल में बंद है। घटना के समय उसकी उम्र बहुत कम थी। जेल प्रशासन की उसका व्यवहार अन्य कैदियों की तुलना में काफी बेहतर रहा है। दोषी ने जेल में रहते हुए न केवल अपनी पढ़ाई जारी रखी, बल्कि गांधीवादी विचारधारा से जुड़े कार्यक्रमों में भी सक्रिय रूप से हिस्सा लिया।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि जेल का मुख्य उद्देश्य अपराधी को केवल दंडित करना नहीं, बल्कि उसे समाज के लिए एक बेहतर इंसान बनाना भी है। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई कैदी पश्चाताप की भावना दिखा रहा है और सुधार की कोशिश कर रहा है, तो उसे एक मौका मिलना चाहिए। दोषी अब तक 10 साल की सजा काट चुका है, जिसे देखते हुए अदालत ने उसे 12 साल के कठोर कारावास के बाद रिहा करने का आदेश दिया।
Voices from the Ground / Official Statements
“सजा का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, बल्कि सुधार होना चाहिए। कैदी ने जेल की दीवारों के बीच महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर निबंध लिखकर यह दर्शाया है कि वह अपनी पुरानी गलतियों को पीछे छोड़ना चाहता है। उसकी कम उम्र और 10 साल के कारावास को ध्यान में रखते हुए सजा में संशोधन आवश्यक था।” — बॉम्बे हाई कोर्ट खंडपीठ

More Stories
Red Fort Blast Case : लाल किला धमाका कांड , 10 आरोपियों के खिलाफ NIA ने कसी नकेल, चार्जशीट में चौंकाने वाले सबूत
MP Firecracker Factory Blast : पटाखा फैक्ट्री में लगी भीषण आग, मलबे में दबने से 3 श्रमिकों ने तोड़ा दम
सस्पेंस खत्म : कमान अब CM V.D. Satheesan के हाथों में, कांग्रेस ने की घोषणा