रायपुर। संसद के बजट सत्र (2026) के पहले दिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने अभिभाषण में छत्तीसगढ़ के बदलते स्वरूप की जमकर प्रशंसा की। राष्ट्रपति ने न केवल बस्तर के ‘पंडुम कैफे’ की सफलता की कहानी देश के सामने रखी, बल्कि नक्सलवाद के खात्मे को लेकर सरकार के निर्णायक आंकड़ों को भी साझा किया।
पंडुम कैफे: बदलाव का नया चेहरा
राष्ट्रपति मुर्मू ने बस्तर के ‘पंडुम कैफे’ का जिक्र करते हुए इसे संघर्ष से शांति की ओर बढ़ते छत्तीसगढ़ का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि जिस बस्तर की पहचान कभी हिंसा से होती थी, आज वहां के युवा और मुख्यधारा में लौटे लोग कैफे के जरिए अपनी नई पहचान बना रहे हैं। यह कैफे न केवल स्थानीय व्यंजनों और कॉफी के लिए जाना जा रहा है, बल्कि यह क्षेत्र में पर्यटन और शांति का नया केंद्र बनकर उभरा है।
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नक्सलवाद पर बड़ी जीत: 126 से घटकर 8 जिलों तक सीमित
राष्ट्रपति ने आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर सरकार की उपलब्धियां गिनाते हुए कहा कि माओवादी हिंसा का दायरा अब अपने न्यूनतम स्तर पर है:
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ऐतिहासिक कमी: पहले देश के 126 जिले नक्सलवाद से प्रभावित थे, जो अब घटकर मात्र 8 जिलों तक सिमट गए हैं।
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अति प्रभावित क्षेत्र: इन 8 जिलों में से भी केवल 3 जिले ही ऐसे हैं, जिन्हें ‘अति प्रभावित’ की श्रेणी में रखा गया है।
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आत्मसमर्पण की लहर: बीते एक साल में लगभग 2000 माओवादियों ने हथियार छोड़कर मुख्यधारा में शामिल होने का फैसला किया है।
25 साल बाद पहुंची बस, बस्तर में उत्सव
राष्ट्रपति ने बीजापुर के एक दूरस्थ गांव का उदाहरण देते हुए भावुक क्षण साझा किया। उन्होंने बताया कि कैसे एक गांव में 25 साल बाद बस पहुंची, तो वहां के ग्रामीणों ने इसे किसी बड़े त्योहार की तरह मनाया। उन्होंने कहा कि सड़कों के जाल और मोबाइल टावरों ने अब उन इलाकों तक विकास की रोशनी पहुंचा दी है, जहां दशकों तक अंधेरा था।
सुरक्षा बलों की निर्णायक कार्रवाई
अभिभाषण के दौरान राष्ट्रपति ने सुरक्षा बलों के साहस की सराहना की। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के कारण माओवादी विचारधारा अब अंतिम सांसें ले रही है।
“माओवादी विचारधारा ने कई पीढ़ियों का भविष्य अंधकार में डाल दिया था, लेकिन आज हमारे आदिवासी भाई-बहन विकास की मुख्यधारा से जुड़कर देश के निर्माण में योगदान दे रहे हैं।” — राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू



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