25 जून 1983—भारतीय क्रिकेट की कालजयी तारीख। ठीक 42 साल पहले कपिल देव की कप्तानी में टीम इंडिया ने लॉर्ड्स पर वह चमत्कार कर दिखाया, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी: पहली बार वनडे विश्व कप पर कब्ज़ा और वह भी अपराजेय मानी जाने वाली वेस्टइंडीज को हराकर।
धमाकेदार आग़ाज़, फिर उतार–चढ़ाव
टूर्नामेंट की शुरुआत भारत ने वेस्टइंडीज को 34 रन से मात देकर की, फिर ज़िम्बाब्वे पर 5 विकेट से जीत दर्ज की। अगले दो मैचों में ऑस्ट्रेलिया से 162 रन और वेस्टइंडीज से 66 रन की बड़ी हार ने राह मुश्किल कर दी, लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी।
कपिल देव की ‘175 नाबाद’
पाँचवाँ मुकाबला ज़िम्बाब्वे से था। 17/5 के संकट में कप्तान कपिल देव ने 128 गेंदों में 16 चौके–6 छक्कों से सजी नाबाद 175 रन की ऐतिहासिक पारी खेली। भारत ने 60 ओवर में 266/8 बनाए और गेंदबाज़ों ने ज़िम्बाब्वे को 235 पर समेटकर 31 रन से जीत दिलाई। इस साहसिक प्रदर्शन ने टीम का आत्म-विश्वास लौटा दिया।
सेमीफ़ाइनल में इंग्लैंड ढेर, फाइनल में वेस्टइंडीज का घमंड टूटा
लय पकड़ चुकी टीम इंडिया ने लीग में ऑस्ट्रेलिया, सेमीफ़ाइनल में इंग्लैंड को हराकर फाइनल का टिकट काटा। फाइनल में 183 पर सिमटने के बाद भी भारतीय गेंदबाज़ों ने कमाल कर दिखाया—वेस्टइंडीज को 52 ओवर में महज़ 140 पर ऑलआउट कर 43 रन से ऐतिहासिक जीत दर्ज की।
इस तरह कपिल देव की टोली ने न सिर्फ़ 35 दिनों में दुनिया को चौंकाया, बल्कि भारतीय क्रिकेट में आत्म-विश्वास और जीत का ड़ीएनए भी बो दिया। इसके बाद दूसरा विश्व कप ख़िताब 2011 में महेन्द्र सिंह धोनी की अगुआई में आया, पर 1983 की वह पहली उड़ान हमेशा स्वर्णिम रहेगी।



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