जमीन पर सन्नाटा, हवा में डर
सुबह बाजार खुलते हैं, बच्चे स्कूल जाते हैं। लेकिन शाम ढलते ही माहौल बदल जाता है। कई इलाकों में लोग बताते हैं—“कभी भी गोली चल सकती है।” दोनों समुदायों के कुछ हथियारबंद समूहों की मौजूदगी ने हालात को और पेचीदा बना दिया है। sporadic firing की घटनाएं बीच-बीच में सामने आती रही हैं। एक स्थानीय निवासी ने कहा, “आप बाहर निकलते हैं, लेकिन हर कदम सोच-समझकर रखते हैं। डर खत्म नहीं हुआ।”
राजनीति बदली, हालात जस के तस?
इन तीन सालों में सत्ता के स्तर पर बदलाव हुए। नेतृत्व बदला। फैसले लिए गए। लेकिन जमीनी शांति अब भी अधूरी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक और जातीय तनाव का परिणाम है। यही वजह है कि समाधान धीमा दिखता है।
केंद्र की रणनीति: 2029 पर नजर
केंद्र सरकार ने संकेत दिए हैं कि 2029 तक उग्रवाद खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत सुरक्षा, संवाद और विकास—तीनों मोर्चों पर काम करने की योजना है। लेकिन सवाल बना हुआ है—क्या सिर्फ सुरक्षा से भरोसा लौटेगा? या फिर जमीनी स्तर पर संवाद ही असली रास्ता है?

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