Khatu Shyam Temple नई दिल्ली। खाटू नरेश बाबा श्याम के भक्तों में इत्र अर्पित करने की परंपरा को अत्यंत पावन और आस्था से जुड़ा माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सही विधि से “इत्र की अर्जी” लगाने पर बाबा श्याम अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। इत्र को प्रेम, समर्पण और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
तीन शीशियों की परंपरा का विशेष महत्व
मंदिर में दर्शन के दौरान कई भक्त बाबा श्याम को तीन शीशियों में इत्र अर्पित करते हैं। मान्यता के अनुसार, पहली शीशी बाबा के चरणों में अर्जी लगाने के रूप में चढ़ाई जाती है। दूसरी शीशी मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना और धन्यवाद के भाव के साथ अर्पित की जाती है। तीसरी शीशी तब चढ़ाई जाती है जब भक्त की इच्छा पूरी हो जाती है, जिसे आभार और भोग के रूप में बाबा को समर्पित किया जाता है।भक्तों का विश्वास है कि इस परंपरा के माध्यम से वे बाबा के प्रति अपना समर्पण व्यक्त करते हैं और जीवन में सकारात्मक परिणाम प्राप्त करते हैं।
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इत्र अर्पण की विधि
मान्यता के अनुसार, मंदिर में दर्शन के दौरान जब श्रद्धालु कतार में होते हैं, तब पुजारी या सेवादार के माध्यम से इत्र बाबा श्याम के चरणों में अर्पित किया जाता है। इस दौरान भक्त हाथ जोड़कर अपनी मनोकामना मन में व्यक्त करते हैं।इसके बाद सेवादार द्वारा इत्र सेवा की जाती है और प्रसाद स्वरूप कुछ इत्र भक्तों को वापस दिया जाता है, जिसे घर लाकर सुरक्षित रखा जाता है। यह इत्र शुभ माना जाता है और इसे मनोकामना पूर्ण होने तक संभालकर रखने की परंपरा है।
इत्र अर्पण के दौरान सावधानियां
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बाबा श्याम को गुलाब और केसर की खुशबू अधिक प्रिय मानी जाती है। इसलिए शुद्ध और प्राकृतिक इत्र का ही उपयोग करने की सलाह दी जाती है।इत्र को सीधे मूर्ति के चेहरे पर लगाने के बजाय चरणों में या फूलों पर अर्पित करना उचित माना जाता है। घर पर पूजा के दौरान भी इत्र को सीमित मात्रा में ही प्रयोग करना चाहिए, ताकि पूजा की पवित्रता बनी रहे।
आस्था और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक
भक्तों का मानना है कि इत्र अर्पण केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि गहरी आस्था और आत्मिक जुड़ाव का माध्यम है। इससे मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और जीवन में शांति एवं संतोष की अनुभूति होती है।

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