मायके में रहने पर भी भरण-पोषण अनिवार्य
न्यायमूर्ति गौतम भादुड़ी और न्यायमूर्ति राधाकिशन अग्रवाल की खंडपीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। हाई कोर्ट ने डिज़ोल्यूशन ऑफ मुस्लिम मैरिज एक्ट, 1939 की व्याख्या करते हुए कहा कि कानून की धारा 2(ii) के तहत पति का यह कर्तव्य है कि वह अपनी पत्नी की बुनियादी जरूरतों को पूरा करे। कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण प्रदान करने में विफलता स्वयं में तलाक का एक ठोस आधार है।
अदालत ने अपने फैसले में जोर देकर कहा कि अगर पत्नी किन्हीं कारणों से अपने मायके (maternal home) में रह रही है, तब भी पति उसे खर्च देने के लिए बाध्य है। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि पत्नी के साथ न रहने पर भरण-पोषण की आवश्यकता नहीं है, लेकिन हाई कोर्ट ने इसे कानूनन गलत ठहराया है। खंडपीठ ने निचली अदालत के उस फैसले को पलट दिया जिसमें पत्नी की तलाक की अर्जी को इस आधार पर खारिज किया गया था कि वह खुद अलग रह रही थी।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी
“मुस्लिम कानून के तहत, पति की यह कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है कि वह अपनी पत्नी का भरण-पोषण करे। यदि वह लगातार दो साल तक इस कर्तव्य में विफल रहता है, तो पत्नी अधिनियम की धारा 2 के तहत विवाह विच्छेद (डिज़ोल्यूशन) की हकदार हो जाती है। मायके में रहने से पति की यह जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।” — हाई कोर्ट खंडपीठ, बिलासपुर
समान मामलों पर पड़ेगा असर
हाई कोर्ट का यह निर्णय प्रदेश भर की फैमिली कोर्ट्स (पारिवारिक न्यायालयों) के लिए नजीर बनेगा। अब बिलासपुर, रायपुर और दुर्ग जैसे शहरों में लंबित ऐसे मामलों में तेजी आएगी जहां भरण-पोषण के अभाव में महिलाएं तलाक चाहती हैं। इस फैसले से उन महिलाओं को बड़ी राहत मिली है जो आर्थिक तंगी के कारण कानूनी लड़ाई नहीं लड़ पा रही थीं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक प्रगतिशील कदम है, जो वैवाहिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।

More Stories
CGPSC Scam : जेल में बंद टामन सोनवानी की बिगड़ी तबीयत, अंबेडकर अस्पताल में भर्ती
CG BREAKING : IGKV में फिर पेपर लीक का दावा, परीक्षा से 6 घंटे पहले ‘फंडामेंटल ऑफ जेनेटिक्स’ पेपर वायरल
Raksha Bandhan Special Train : रक्षाबंधन पर छत्तीसगढ़ के यात्रियों को रेलवे का तोहफा, दुर्ग-रायगढ़ के बीच चलेगी स्पेशल ट्रेन