घाटे का दबाव, फैसले की घड़ी करीब
राज्य पावर कंपनी ने नियामक आयोग के सामने भारी घाटे की याचिका रखी। आंकड़ा छोटा नहीं है। 6300 करोड़ रुपये—इतना बड़ा गैप भरना आसान नहीं। फरवरी में जनसुनवाई हुई। लोग आए, बोले, विरोध भी हुआ। लेकिन फैसला? अभी भी टेबल पर अटका है। पिछले ढाई महीने से आयोग संतुलन खोज रहा है। एक तरफ कंपनियों का घाटा। दूसरी तरफ जनता की जेब। बीच में फंसा सिस्टम। यही असली लड़ाई है।
क्यों बढ़ सकती हैं दरें
बिजली उत्पादन लागत बढ़ी है। कोयले की कीमत, ट्रांसमिशन खर्च, मेंटेनेंस—सब ऊपर। रेवेन्यू उतना नहीं बढ़ा। नतीजा साफ है। घाटा बढ़ा। अब या तो सब्सिडी बढ़े, या दरें।
- कोयले की लागत में लगातार बढ़ोतरी
- ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन लॉस
- बकाया बिलों की वसूली में कमी
- सब्सिडी का दबाव
एक अधिकारी ने ऑफ द रिकॉर्ड कहा—फैसला आसान नहीं। “हर यूनिट पर कुछ पैसे बढ़ते हैं तो भी असर बड़ा होता है।”

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