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April 17, 2026

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CG NEWS : सरगुजिहा बोली बोलने पर मासूम का एडमिशन रिजेक्ट, प्ले स्कूल पर विवाद

अंबिकापुर। छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर शहर में एक निजी प्ले स्कूल द्वारा सरगुजिहा बोली बोलने के आधार पर एक मासूम बच्चे का एडमिशन ठुकराने का गंभीर मामला प्रकाश में आया है। यह घटना तब सामने आई जब परिजनों ने बच्चे के दाखिले के लिए स्कूल प्रबंधन से संपर्क किया, लेकिन बच्चे के स्थानीय बोली में बात करने के कारण उसे प्रवेश देने से मना कर दिया गया। एक ओर जहां राज्य सरकार सरकारी स्कूलों में स्थानीय संस्कृति और सरगुजिहा भाषा को बढ़ावा देने के लिए शिक्षकों को इसी बोली में पढ़ाने के निर्देश दे रही है, वहीं निजी स्कूल के इस रवैये ने भाषाई अस्मिता पर नई बहस छेड़ दी है।

निजी स्कूल की मनमानी से उपजा विवाद

अंबिकापुर के इस प्रतिष्ठित प्ले स्कूल पर आरोप है कि इंटरव्यू के दौरान जब बच्चे ने अपनी सहज सरगुजिहा बोली का प्रयोग किया, तो प्रबंधन ने इसे ‘स्टैंडर्ड के विपरीत’ बताते हुए दाखिला देने से इनकार कर दिया। परिजनों का कहना है कि बच्चे को उसकी मातृभाषा की वजह से शिक्षा के अधिकार से वंचित करना न केवल भेदभावपूर्ण है, बल्कि स्थानीय संस्कृति का अपमान भी है।

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सरकार की नीति और स्कूल का रवैया

छत्तीसगढ़ सरकार लगातार स्थानीय बोलियों को शिक्षा का माध्यम बनाने पर जोर दे रही है।

  भाषाई भेदभाव: स्कूल द्वारा अंग्रेजी या हिंदी को प्राथमिकता देकर स्थानीय बोली को कमतर आंकना।

  • सरकारी निर्देश का उल्लंघन: सरकार द्वारा प्राथमिक शिक्षा में क्षेत्रीय बोलियों के उपयोग को प्रोत्साहन देने के दावों के विपरीत निजी संस्थानों की कार्यप्रणाली।

  • सामाजिक आक्रोश: स्थानीय संगठनों और पालकों ने स्कूल के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।

स्थानीय बोली और शिक्षा का अधिकार

विशेषज्ञों का मानना है कि सरगुजिहा भाषा या किसी भी क्षेत्रीय बोली के कारण बच्चे को स्कूल से दूर करना कानूनी रूप से गलत है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) किसी भी बच्चे के साथ भाषा, मूल या क्षेत्र के आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता। अंबिकापुर के इस मामले ने निजी स्कूलों की चयन प्रक्रिया और उनके द्वारा थोपे जा रहे भाषाई मापदंडों पर सवालिया निशान लगा दिया है।

प्रशासन की भूमिका और जांच की मांग

घटना के तूल पकड़ने के बाद जिला शिक्षा विभाग तक भी यह मामला पहुंच गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि निजी संस्थान क्षेत्रीय भाषाओं को सम्मान नहीं देंगे, तो नई पीढ़ी अपनी जड़ों से कट जाएगी। फिलहाल, पीड़ित परिवार ने मामले की लिखित शिकायत उच्च अधिकारियों से करने का निर्णय लिया है।

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