CG Crime News : महासमुंद। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले से जुड़े नकली नोट मामले में विशेष एनआईए (NIA) न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी तीर्थराज प्रधान को बरी कर दिया है। विशेष एनआईए न्यायाधीश सिराजुद्दीन कुरैशी ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन पक्ष यह प्रमाणित नहीं कर सका कि आरोपी को बरामद किए गए नोटों के नकली होने की जानकारी थी या वह उन्हें असली बताकर बाजार में चलाने का इरादा रखता था। पर्याप्त और ठोस साक्ष्य के अभाव में अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया।
नकली नोट रखने के आरोप में हुई थी गिरफ्तारी
मामला महासमुंद जिले के सांकरा थाना क्षेत्र का है, जहां पुलिस ने नकली नोट रखने के आरोप में तीर्थराज प्रधान को गिरफ्तार किया था। जांच के बाद प्रकरण विशेष एनआईए न्यायालय में विचाराधीन था। अभियोजन पक्ष ने आरोपी के खिलाफ विभिन्न साक्ष्य और गवाह प्रस्तुत किए, लेकिन सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
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अदालत ने फैसले में क्या कहा?
विशेष एनआईए न्यायाधीश सिराजुद्दीन कुरैशी ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल किसी व्यक्ति के पास नकली नोटों का पाया जाना ही उसे दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को यह भी साबित करना आवश्यक होता है कि आरोपी को नोटों के नकली होने की जानकारी थी और वह उन्हें जानबूझकर असली बताकर उपयोग या प्रचलन में लाना चाहता था। अदालत ने कहा कि इस मामले में ऐसे आवश्यक तथ्यों को प्रमाणित नहीं किया जा सका।
संदेह का लाभ मिलने पर मिली राहत
भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली के अनुसार यदि किसी मामले में आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं हो पाते, तो आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाता है। इसी सिद्धांत का पालन करते हुए विशेष अदालत ने तीर्थराज प्रधान को बरी करने का आदेश दिया। अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्य दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
अभियोजन की दलीलें नहीं हुईं पर्याप्त साबित
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने आरोपी के खिलाफ कई तर्क प्रस्तुत किए, लेकिन अदालत ने माना कि केवल परिस्थितिजन्य तथ्यों के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में दोष सिद्ध करने के लिए ठोस, विश्वसनीय और निर्विवाद साक्ष्य आवश्यक होते हैं। इस मामले में ऐसी कड़ी स्थापित नहीं हो सकी।
विशेष एनआईए कोर्ट के इस फैसले के बाद कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय एक बार फिर इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि किसी भी आरोपी को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता, जब तक उसके खिलाफ लगाए गए आरोप न्यायालय में संदेह से परे सिद्ध न हो जाएं। वहीं, यदि अभियोजन पक्ष इस फैसले से असहमत होता है, तो उसे कानून के तहत उच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार प्राप्त है। फिलहाल, अदालत के आदेश के बाद आरोपी को इस मामले में राहत मिल गई है।

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