- कानूनी मिसाल: हाईकोर्ट ने कहा—तकनीकी कारणों (सर्टिफिकेट की कमी) से सबूतों को खारिज नहीं कर सकती फैमिली कोर्ट।
- नया आदेश: जस्टिस संजय के. अग्रवाल की बेंच ने महासमुंद फैमिली कोर्ट के फैसले को निरस्त कर दोबारा सुनवाई के निर्देश दिए।
- विवाद की जड़: पति का दावा—पत्नी बॉयफ्रेंड को करती थी ‘न्यूड कॉल’; पत्नी का आरोप—पति ने बेडरूम में कैमरा लगाकर छीनी निजता।
रायगढ़ : Chhattisgarh High Court ने वैवाहिक विवादों और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। रायगढ़ के एक दंपति के बीच चल रहे हाई-प्रोफाइल तलाक केस में कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि फैमिली कोर्ट विवाद सुलझाने के लिए किसी भी डिजिटल सबूत या सीडी (CD) को स्वीकार कर सकती है, भले ही उसके साथ तकनीकी प्रमाणपत्र (Section 65-B) न लगा हो।
‘प्राइवेसी’ बनाम ‘सबूत’: क्या है पूरा मामला?
यह मामला साल 2012 में शुरू हुई एक शादी का है। तमनार (रायगढ़) में कार्यरत पति ने अपनी पत्नी पर गंभीर आरोप लगाते हुए तलाक की अर्जी दी थी। पति का दावा था कि उसकी पत्नी अन्य पुरुषों के साथ अश्लील चैटिंग और न्यूड वीडियो कॉल करती थी। इन आरोपों को साबित करने के लिए पति ने बेडरूम में चोरी-छिपे सीसीटीवी कैमरे लगाए और उनकी फुटेज को सीडी के रूप में अदालत में पेश किया।
दूसरी ओर, पत्नी ने पति पर दहेज प्रताड़ना और मारपीट का आरोप लगाया। पत्नी की दलील थी कि बेडरूम में कैमरा लगवाना उसकी निजता (Privacy) का हनन है। पूर्व में महासमुंद फैमिली कोर्ट ने पति की दलीलों और सीडी को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि इसके साथ एविडेंस एक्ट की धारा 65-B का सर्टिफिकेट मौजूद नहीं है।
“फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 14 और 20 के तहत, अदालत के पास किसी भी विवाद को प्रभावी ढंग से सुलझाने के लिए साक्ष्य स्वीकार करने की व्यापक शक्ति है। तकनीकी आधार पर ठोस सबूतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”
— जस्टिस संजय के. अग्रवाल और अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां
डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान फैमिली कोर्ट के पुराने आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
- प्राथमिकता: यह मामला पिछले 4 साल से लंबित है, इसलिए फैमिली कोर्ट इसे प्राथमिकता के आधार पर निपटाए।
- साक्ष्य की स्वीकार्यता: सीसीटीवी फुटेज वाली सीडी को रिकॉर्ड पर लेकर उसके आधार पर दोबारा सुनवाई की जाए।
- विशिष्ट शक्तियां: फैमिली कोर्ट को सामान्य सिविल अदालतों की तुलना में साक्ष्यों को परखने के लिए अधिक लचीली शक्तियां प्राप्त हैं।



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