नियमों की अनदेखी, त्रुटिपूर्ण मतदाता सूची और महिला आरक्षण का पालन न होने पर हाईकोर्ट का स्टे
अधिवक्ता संघ का चुनाव, जिसे एक ‘पारिवारिक चुनाव’ माना जाता है, अब पूरी तरह से विवादों और राजनीति की भेंट चढ़ चुका है। निवर्तमान कार्यकारिणी और चुनाव अधिकारी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। नियमों की स्पष्ट अनदेखी और माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का पालन न करने के कारण चुनाव पर माननीय उच्च न्यायालय (High Court) ने स्टे लगा दिया है। अब यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या अनुभवी पदाधिकारियों द्वारा हुई ये ‘चूक’ कोई साधारण गलती है या फिर चुनाव टालने की कोई सोची-समझी राजनीतिक साजिश?
संवैधानिक नियमों की खुली अनदेखी
चुनाव प्रक्रिया में शुरू से ही संविधान और नियमों को ताक पर रख दिया गया।
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समय सीमा का उल्लंघन: संघ के संविधान के अनुसार, कार्यकारिणी का कार्यकाल समाप्त होने के 40 दिन पूर्व चुनाव की घोषणा हो जानी चाहिए। परंतु ऐसा नहीं किया गया।
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अधिकार विहीन नियुक्ति: कार्यकारिणी का कार्यकाल दिनांक 10.02.2026 को ही समाप्त हो चुका था। नियमतः कार्यकाल समाप्त होने के बाद प्रबंधकारिणी को चुनाव अधिकारी नियुक्त करने का कोई अधिकार नहीं रह जाता। इसके बावजूद 23.03.2026 को चुनाव अधिकारी की नियुक्ति की गई, जो पूरी तरह से असंवैधानिक है।
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अनिवार्य समय का अभाव: चुनाव अधिकारी ने भी संविधान के अनुसार चुनाव के लिए 40 दिन का अनिवार्य समय नहीं दिया। 25.03.2026 को आनन-फानन में चुनाव की तारीख 17.04.2026 तय कर दी गई।
त्रुटिपूर्ण और बिना जांची गई मतदाता सूची
मतदाता सूची (Voter List) के प्रकाशन में भी भारी लापरवाही बरती गई है।
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प्रारंभिक प्रकाशन के बाद सूची को अद्यतन (Update) नहीं किया गया।
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नियम के विरुद्ध जाकर किसी भी प्रकार का दावा या आपत्ति नहीं मंगाया गया और सीधे अंतिम प्रकाशन कर दिया गया।
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नतीजा यह है कि वर्तमान मतदाता सूची में कई मृत अधिवक्ताओं के नाम भी शामिल हैं, जिन्हें अवलोकन कर हटाया नहीं गया।
महिला आरक्षण की अनदेखी और हाईकोर्ट का हस्तक्षेप
इस पूरे प्रकरण की सबसे बड़ी लापरवाही माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेशों की अवहेलना है।
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सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशानुसार चुनाव में 30% महिला अधिवक्ताओं को आरक्षण दिया जाना अनिवार्य है, लेकिन इसे लागू नहीं किया गया।
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जब एक महिला सदस्य ने बाकायदा आवेदन देकर 30% महिला आरक्षण लागू करने की मांग की और इसे संज्ञान में लाया, तो उस आवेदन को भी सिरे से खारिज कर दिया गया।
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इसी मनमानी का परिणाम है कि मामला हाईकोर्ट पहुंचा और चुनाव पर स्थगन (Stay) लग गया।
गंभीर चिंतन और उठते हुए अहम सवाल
इस पूरी प्रक्रिया ने संघ के ‘पारिवारिक माहौल’ में पनप रही राजनीति को उजागर कर दिया है। कुछ ऐसे गंभीर सवाल हैं जिनके जवाब खोजना बहुत जरूरी है:
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अंकेक्षण (Audit) क्यों नहीं हुआ? जब कार्यकारिणी द्वारा सूची बनाई गई, तो महिलाओं के 30% आरक्षण का अंकेक्षण क्यों नहीं किया गया? चुनाव अधिकारी ने इसका अवलोकन क्यों नहीं किया?
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अनुभवहीनता या जानबूझकर की गई गलती? कार्यकारिणी के पदाधिकारी (अध्यक्ष, सचिव) और स्वयं चुनाव अधिकारी पूर्व में संघ के अध्यक्ष और राज्य विधिज्ञ परिषद जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं। इतने अनुभवी लोगों से कानून और संविधान की इतनी बड़ी चूक कैसे हो सकती है?
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समय रहते सुधार क्यों नहीं? जब महिला अधिवक्ता ने आरक्षण की याद दिलाते हुए आवेदन दिया था, अगर उसी समय गलती मानकर संशोधन कर लिया जाता तो आज हाईकोर्ट से स्टे नहीं लगता। इसे खारिज क्यों किया गया?
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प्रत्याशियों के नुकसान का जिम्मेदार कौन? पदाधिकारियों की इस ‘गलती’ और हठधर्मिता का खामियाजा वे बेकसूर प्रत्याशी भुगत रहे हैं जिन्होंने चुनाव की तैयारी में अपना समय और संसाधन लगाया है।
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क्या यह कोई राजनीतिक साजिश है? क्या किसी राजनीतिक मंशा के तहत जानबूझकर आरक्षण और चुनाव प्रक्रिया में ऐसी गलतियां की गईं ताकि चुनाव को विलंबित (Delay) किया जा सके?
आगे का रास्ता क्या है?
संविधान के स्पष्ट नियम के अनुसार, यदि कार्यकाल समाप्त होने के एक माह बाद भी चुनाव नहीं कराए जाते हैं, तो राज्य विधिज्ञ परिषद (State Bar Council) को तदर्थ समिति (Ad-hoc Committee) बनाकर चुनाव कराने का अधिकार है।
चूंकि वर्तमान में पूरी चुनाव प्रक्रिया दूषित और असंवैधानिक हो चुकी है, इसलिए अब निष्पक्षता और न्याय की मांग यही है कि राज्य विधिज्ञ परिषद तत्काल हस्तक्षेप करे, तदर्थ समिति का गठन करे और एक पारदर्शी, संवैधानिक और निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराए।



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