CG NEWS : भिलाई। छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का एक अनूठा स्वरूप भिलाई क्षेत्र में देखने को मिला, जहां आधी रात को ‘सवनाही’ की पारंपरिक रस्म निभाई गई। रात करीब 12 बजे जब पूरा गांव गहरी नींद में था, तब गांव के बैगा, बुजुर्ग और ग्रामीण शीतला माता मंदिर में एकत्र हुए। विशेष पूजा-अर्चना के बाद बैगा ने नारियल और पूजन सामग्री के साथ गांव की चारों दिशाओं की परिक्रमा कर पारंपरिक तरीके से ‘गांव बांधने’ की रस्म पूरी की। मान्यता है कि इस परंपरा से गांव को महामारी, प्राकृतिक आपदा और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा मिलती है तथा पूरे वर्ष सुख-समृद्धि बनी रहती है।
क्या है सवनाही परंपरा?
सवनाही छत्तीसगढ़ की प्राचीन लोक परंपराओं में से एक है, जिसे विशेष अवसरों पर गांव की रक्षा और सामूहिक कल्याण की कामना के लिए निभाया जाता है। इस परंपरा में बैगा या गांव के पारंपरिक पुजारी विशेष पूजा करते हैं और उसके बाद गांव की सीमाओं तक जाकर धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करते हैं।
लोक मान्यता है कि इस अनुष्ठान के माध्यम से गांव की चारों दिशाओं को आध्यात्मिक रूप से सुरक्षित किया जाता है, जिससे बीमारियां, महामारी और अन्य संकट गांव की सीमा में प्रवेश नहीं करते।
आधी रात को क्यों निभाई जाती है यह रस्म?
ग्रामीणों के अनुसार, सवनाही की परंपरा आधी रात को इसलिए निभाई जाती है क्योंकि उस समय वातावरण शांत रहता है और धार्मिक अनुष्ठान बिना किसी व्यवधान के पूरे किए जाते हैं। पूजा के दौरान बैगा विशेष मंत्रोच्चार करते हैं और नारियल, हल्दी, चावल तथा अन्य पूजन सामग्री के साथ गांव की सीमाओं पर धार्मिक विधि पूरी करते हैं।
इस दौरान गांव के अधिकांश लोग अपने घरों के भीतर ही रहते हैं और परंपरा का सम्मान करते हुए बाहर नहीं निकलते।
शीतला माता मंदिर से होती है शुरुआत
पूरे अनुष्ठान की शुरुआत शीतला माता मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना से होती है। बैगा, गांव के बुजुर्ग और अन्य श्रद्धालु माता का आशीर्वाद लेकर गांव की चारों दिशाओं की ओर प्रस्थान करते हैं। प्रत्येक दिशा में धार्मिक अनुष्ठान करने के बाद वे पुनः मंदिर लौटते हैं और गांव की सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं।
ग्रामीणों का विश्वास है कि इस परंपरा से पूरे गांव में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सभी परिवारों पर देवी-देवताओं की कृपा बनी रहती है।
पीढ़ियों से चली आ रही है यह लोक परंपरा
सवनाही केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है और आज भी ग्रामीण समाज इसे पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ निभाता है।
बुजुर्गों का कहना है कि आधुनिक दौर में भी इस तरह की लोक परंपराएं सामाजिक एकता, सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक विश्वास को मजबूत करने का कार्य करती हैं।

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