सरकारी भूमि हो या किसी गरीब और असहाय व्यक्ति की जीवन भर की गाढ़ी कमाई से खरीदी गई रजिस्टर्ड जमीन, आज के दौर में उस पर असली कब्जा अक्सर धनबल और बाहुबलियों का ही देखने को मिलता है। यह हमारे सिस्टम की एक बेहद कड़वी और चुभने वाली सच्चाई है कि समाज में सच्चा और ईमानदार व्यक्ति न्याय के लिए तहसीलों, थानों और अदालतों के चक्कर काट-काटकर तरसता रहता है। उसे अपनी ही जमीन बचाने के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं, जबकि राजनीतिक संरक्षण प्राप्त लोग अपने जनबल, बाहुबल और धनबल के गहरे अहंकार में किसी की भी संपत्ति पर बेखौफ होकर कब्जा जमा लेते हैं। भू-माफियाओं का यह बेलगाम आतंक और प्रशासनिक व्यवस्था की यह लाचारी आम आदमी के मन में गहरे अविश्वास, आक्रोश और निराशा को जन्म दे रही है।
इस भ्रष्ट और खोखली होती जा रही प्रशासनिक व्यवस्था की एक स्पष्ट और खौफनाक बानगी हाल ही में नगर निगम जोन क्रमांक 10 के एक बड़े मामले में देखने को मिली है। यहाँ किसी एक-दो जमीन की नहीं, बल्कि पूरे 69 खसरों की अत्यंत महत्वपूर्ण फाइलें ही कार्यालय से रहस्यमय तरीके से गायब हो गईं। यह कोई छोटी-मोटी घटना नहीं है, बल्कि सिस्टम के भीतर बैठे दीमकों का एक पुख्ता प्रमाण है। इस भारी गड़बड़ी और भ्रष्टाचार के आरोप में शासन ने प्रथम दृष्टया सख्त कदम उठाते हुए जोन कमिश्नर एवं अधीक्षण अभियंता सहित शीर्ष स्तर के चार बड़े अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। सरकारी कार्यालयों से फाइलों का इस तरह गायब होना कोई साधारण लिपिकीय त्रुटि कतई नहीं है। यह एक सोची-समझी आपराधिक साजिश की ओर स्पष्ट इशारा करती है, जिसका सीधा उद्देश्य बड़े भू-माफियाओं को अनुचित लाभ पहुंचाना और सरकारी या निजी जमीनों के हेरफेर के काले सच को हमेशा के लिए दफनाना है।
जाहिर है, जब इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी और परत-दर-परत हकीकत सामने आएगी, तो कई रसूखदारों और सफेदपोश चेहरों से नकाब उठेगा। आखिर यह पूरा माजरा क्या है और इन 69 खसरों में किन धनकुबेरों के करोड़ों के वारे-न्यारे छिपे हैं, यह जांच का एक बहुत बड़ा विषय है। लेकिन यहाँ सबसे बड़ा और डराने वाला सवाल यह उठता है कि क्या ये 69 फाइलें ही इस भ्रष्टाचार का अंत हैं? बिल्कुल नहीं। इस एक खुलासे के बाद प्रशासनिक अमले की कार्यप्रणाली पर जो सवालिया निशान लगा है, वह आसानी से मिटने वाला नहीं है। आज हर जागरूक व्यक्ति के जहन में यही सवाल है कि सिस्टम के इन अंधेरे कमरों से न जाने कितनी और फाइलें गायब हैं, यह तो बस आने वाला वक्त ही बताएगा। जब मात्र एक जोन के दफ्तर से इतनी बड़ी संख्या में सरकारी दस्तावेज खुर्द-बुर्द किए जा सकते हैं, तो अन्य जोनों और विभागों में कितने खसरों, नक्शों और दस्तावेजों के साथ अब तक कितनी बार छेड़छाड़ हुई होगी, इसका केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है। यह तो महज़ एक बानगी है; असल तस्वीर तो और भी भयावह हो सकती है।
भू-माफियाओं, नेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों का यह गठजोड़ इतना मजबूत और गहरा है कि आम जनता न्याय की गुहार लगाते हुए फाइलों के इसी मकड़जाल में उलझकर टूट जाती है। एक आम आदमी अपनी एक छोटी सी जमीन का सीमांकन कराने या नामांतरण करवाने के लिए महीनों सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाता है, उसे रोज नए नियमों की दुहाई दी जाती है। वहीं दूसरी ओर, रसूखदारों के लिए रातों-रात नियम बदल जाते हैं और अड़चन पैदा करने वाली फाइलें ही रातों-रात गायब कर दी जाती हैं। जो अधिकारी जनता के कानूनी अधिकारों के रक्षक बनाए गए थे, जब वही चंद पैसों की खनक के आगे अपना जमीर बेचकर भक्षक बन जाएं, तो समाज में न्याय की उम्मीद किससे की जाए?
फिलहाल, इस पूरे प्रकरण का भविष्य शासन की आगे की छानबीन और जांच एजेंसियों की ईमानदारी पर निर्भर करता है। शासन ने बड़े अधिकारियों को निलंबित कर अपनी ओर से एक कड़ा संदेश देने की कोशिश जरूर की है, लेकिन आम जनता का अब तक का अनुभव कुछ और ही कहानी कहता है। विडंबना यह है कि हमारे देश में ऐसे मामलों में जांच कमेटियां तो बड़े जोर-शोर से बैठती हैं, लेकिन समय के साथ वे ठंडे बस्ते में चली जाती हैं। ऐसे में आम जनमानस की यह आशंका बिल्कुल भी निर्मूल नहीं है कि देर-सबेर जांच और कार्रवाई की यह वर्तमान फाइल भी किसी सरकारी तहखाने में उसी तरह ‘गुम’ हो जाएगी, जैसे वे 69 खसरों की फाइलें गायब हुई हैं। जब तक राजनीतिक संरक्षण का यह खेल बंद नहीं होगा और दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक न्याय केवल कागजों तक ही सीमित रहेगा।

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