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April 5, 2026

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Supreme Court Transgender Petition

Supreme Court Transgender Petition

Supreme Court Transgender Petition : अधिकारों पर ‘फाउल’ , नए ट्रांसजेंडर कानून के खिलाफ शीर्ष अदालत में याचिका, परिभाषा पर छिड़ा विवाद

  • संवैधानिक चुनौती: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
  • धारा 2(के) पर विवाद: याचिका में मुख्य रूप से ट्रांसजेंडर व्यक्ति की नई परिभाषा और पहचान के कानूनी मानदंडों पर सवाल उठाए गए हैं।
  • मौलिक अधिकार: याचिकाकर्ताओं का दावा है कि नए संशोधनों से स्वयं के लिंग निर्धारण (Self-determination) का अधिकार प्रभावित हो रहा है।

Supreme Court Transgender Petition , नई दिल्ली — केंद्र सरकार के नए ट्रांसजेंडर संशोधन कानून 2026 के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने अब ‘एंपायर’ की भूमिका संभाल ली है। शीर्ष अदालत में एक याचिका दाखिल कर इस कानून के सबसे विवादित हिस्से, धारा 2(के), को सीधे तौर पर चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि 2019 के मूल एक्ट में किए गए ताज़ा बदलाव ट्रांसजेंडर समुदाय के उन मौलिक अधिकारों पर प्रहार करते हैं, जिन्हें कोर्ट ने पहले ही सुरक्षित किया था। यह कानूनी मुकाबला अब तय करेगा कि भविष्य में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान का आधार क्या होगा।

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मैदान पर तनातनी: परिभाषा में बदलाव ने बढ़ाया विवाद

इस कानूनी लड़ाई का सबसे बड़ा मुद्दा ‘लिंग निर्धारण’ का अधिकार है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सरकार ने परिभाषा को बदलकर समुदाय की स्वायत्तता पर ‘फाउल’ किया है।

  • पहचान का संकट: याचिका के अनुसार, नए नियम ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से उनके लिंग को स्वयं चुनने का हक छीनते हैं।
  • संवैधानिक उल्लंघन: दावा किया गया है कि यह संशोधन अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत मिले समानता और निजता के अधिकारों का हनन करता है।
  • कानूनी पेंच: 2019 के एक्ट की धारा 2(के) में जो फेरबदल किए गए हैं, उन्हें याचिकाकर्ताओं ने ‘मनमाना’ और ‘प्रतिगामी’ करार दिया है।

अदालत में यह मामला ऐसे समय में आया है जब ट्रांसजेंडर समुदाय अपनी सामाजिक और कानूनी पहचान के लिए देश भर में लामबंद हो रहा है। सरकार के इस ‘डिफेंस’ को अब सुप्रीम कोर्ट के कड़े सवालों का सामना करना होगा।

“केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में किए गए संशोधनों से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का अपने लिंग का स्वयं निर्धारण करने का मौलिक अधिकार छीन लिया गया है। यह संशोधन 2014 के ऐतिहासिक नाल्सा (NALSA) फैसले की भावना के विपरीत है।”
— याचिकाकर्ता, सुप्रीम कोर्ट

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