सुकमा आत्मसमर्पण: कैसे टूटा माओवादी नेटवर्क
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, लंबे समय से चलाए जा रहे संपर्क अभियान और पुनर्वास नीति के असर से यह आत्मसमर्पण हुआ। सभी नक्सलियों ने जिला पुलिस मुख्यालय के पास स्थित कैंप में अधिकारियों के सामने हथियार डाले। आत्मसमर्पण के वक्त इलाके में कड़ी सुरक्षा रही। कैंप के बाहर ग्रामीणों की भीड़ जमा रही। माहौल शांत था, लेकिन जिज्ञासा साफ दिखी।
आत्मसमर्पण करने वालों में कई ऐसे चेहरे शामिल हैं, जो सुकमा–कोंटा और चिंतलनार क्षेत्र में सक्रिय दस्तों से जुड़े रहे हैं। इन पर अलग-अलग थानों में गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे।
पुलिस का बयान
“यह आत्मसमर्पण हमारी लगातार चल रही रणनीति और राज्य सरकार की पुनर्वास नीति का नतीजा है। जो लोग मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं, उनके लिए दरवाजे खुले हैं।”
— वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, सुकमा
इलाके पर असर और आगे की योजना
इस आत्मसमर्पण के बाद कोंटा और आसपास के गांवों में सुरक्षा एजेंसियों ने सर्च ऑपरेशन तेज कर दिया है। आम लोगों के लिए कोई पाबंदी नहीं लगाई गई है। पुलिस का कहना है कि आत्मसमर्पण करने वालों को नियमानुसार पुनर्वास पैकेज, कौशल प्रशिक्षण और सुरक्षा दी जाएगी, ताकि वे दोबारा हिंसा के रास्ते पर न लौटें। स्थानीय बाजारों में दिनचर्या सामान्य रही। ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय बाद इलाके में डर का माहौल कुछ कम होता दिख रहा है।

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