इस्लामाबाद/वॉशिंगटन: मिडिल ईस्ट में जारी ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ और भीषण बमबारी के बीच शांति की एक उम्मीद जगी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के बीच हुई बातचीत के बाद पाकिस्तान को इस युद्ध में एक बड़े ‘पीसमेकर’ (शांतिदूत) के रूप में देखा जा रहा है। ट्रंप प्रशासन ने ईरान को जो 15-सूत्रीय सीजफायर प्रस्ताव भेजा है, वह पाकिस्तान के जरिए ही पहुँचाया गया है।
लेकिन सवाल उठता है कि दुनिया के तमाम देशों के बीच पाकिस्तान ही इस भूमिका के लिए फिट क्यों बैठा? इसके पीछे गहरा कूटनीतिक इतिहास और वर्तमान सामरिक मजबूरियां हैं।
1. वॉशिंगटन में ‘ईरान का घर’ है पाकिस्तान
सबसे बड़ा तकनीकी कारण यह है कि 1980 के बाद से अमेरिका और ईरान के बीच कोई औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं। वॉशिंगटन डीसी में पाकिस्तान का दूतावास ही ‘ईरानी हितों के अनुभाग’ (Iranian Interests Section) की मेजबानी करता है। यानी दशकों से अमेरिका में ईरान का कोई भी संदेश या काम होता है, तो वह पाकिस्तानी चैनलों के जरिए ही होता है।
2. ‘फील्ड मार्शल’ और ट्रंप के बीच केमिस्ट्री
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और डोनाल्ड ट्रंप के बीच हाल ही में सीधी बातचीत हुई है। ट्रंप हमेशा से ‘पर्सनल डिप्लोमेसी’ पर भरोसा करते हैं और पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के साथ उनके पुराने संबंध इस मुश्किल घड़ी में बैक-चैनल बातचीत का मुख्य आधार बने हैं।
3. इतिहास दोहरा रहा है खुद को: 1971 का ‘चीन-अमेरिका’ समझौता
पाकिस्तान के पास दो बड़े दुश्मनों को एक मेज पर लाने का ऐतिहासिक अनुभव है:
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पिोंग-पोंग डिप्लोमेसी (1971): शीत युद्ध के दौरान जब अमेरिका और चीन कट्टर दुश्मन थे, तब पाकिस्तान ने ही तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर की गुप्त बीजिंग यात्रा आयोजित करवाई थी।
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इसी मध्यस्थता के कारण राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की ऐतिहासिक चीन यात्रा संभव हुई और दुनिया की राजनीति बदल गई। अब ट्रंप उसी तर्ज पर ईरान के साथ डील करना चाहते हैं।
4. पाकिस्तान की अपनी मजबूरी
पाकिस्तान इस समय खुद गहरे आर्थिक संकट और पड़ोसी अफगानिस्तान के साथ संघर्ष (तालिबान पर एयरस्ट्राइक) से जूझ रहा है।
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तेल की कीमतें: ईरान युद्ध के कारण तेल की बढ़ती कीमतें पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को तबाह कर रही हैं।
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रणनीतिक लाभ: यदि पाकिस्तान इस समझौते को सफल बना लेता है, तो उसे अमेरिका से भारी आर्थिक मदद और अंतरराष्ट्रीय मंच पर खोया हुआ सम्मान वापस मिल सकता है।

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