काउंसिल के अधिकारों का उल्लंघन: क्या है पूरा मामला?
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार ने फार्मेसी एक्ट के नियमों को दरकिनार कर रजिस्ट्रार की नियुक्ति की थी। फार्मेसी अधिनियम, 1948 की धाराओं के अनुसार, रजिस्ट्रार की नियुक्ति करने की शक्ति केवल स्टेट फार्मेसी काउंसिल के पास सुरक्षित है। सरकार केवल काउंसिल द्वारा प्रस्तावित नाम पर अपनी सहमति या प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी कर सकती है, लेकिन वह स्वयं चयनकर्ता की भूमिका नहीं निभा सकती। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि काउंसिल एक स्वायत्त निकाय है और इसमें सरकार का सीधा हस्तक्षेप इसकी कार्यप्रणाली को प्रभावित करता है। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए वर्तमान रजिस्ट्रार के प्रभार और नियुक्ति को तत्काल प्रभाव से शून्य घोषित कर दिया।
“कानूनी प्रावधानों के अनुसार रजिस्ट्रार की नियुक्ति का अधिकार केवल काउंसिल के पास है। राज्य सरकार सीधे तौर पर इस पद पर नियुक्ति नहीं कर सकती। प्रक्रिया का पालन न करना कानून का उल्लंघन है।”
— छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (सुनवाई के दौरान टिप्पणी)
इस फैसले के बाद अब काउंसिल में नए रजिस्ट्रार की नियुक्ति की प्रक्रिया नए सिरे से शुरू करनी होगी। पिछले कुछ समय से काउंसिल के कामकाज और नियुक्तियों को लेकर विवाद चल रहा था। बिलासपुर और रायपुर के फार्मेसी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से स्वायत्त निकायों में राजनीतिक हस्तक्षेप कम होगा। फिलहाल, रजिस्ट्रार का पद रिक्त होने से काउंसिल के प्रशासनिक कार्यों, जैसे कि नए फार्मेसिस्टों के रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस रिन्यूअल की प्रक्रिया में कुछ दिनों की देरी हो सकती है। सरकार अब इस फैसले को डिवीजन बेंच में चुनौती देती है या काउंसिल को नियुक्ति के निर्देश देती है, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।
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