रायपुर (व्यंग्य ब्यूरो)। लोकतंत्र में अक्सर कहा जाता है कि सरकार और जनता के बीच की दूरी कम होनी चाहिए। लगता है छत्तीसगढ़ के महानिरीक्षक पंजीयन एवं अधीक्षक मुद्रांक कार्यालय ने इस बात को थोड़ा ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया है। 1 अक्टूबर 2026 को जारी एक ऐतिहासिक फरमान के अनुसार, आगामी 31 अक्टूबर 2026 के बाद कार्यालय के अधिकारियों और कर्मचारियों को लाने-ले-जाने वाली सिटी बस सेवा की ‘अंतिम यात्रा’ संपन्न होने जा रही है। विभाग ने हाथ खड़े करते हुए साफ कह दिया है कि बाबू लोग अब दफ्तर आने-जाने के लिए “स्वयं के स्तर पर” व्यवस्था सुनिश्चित करें।

सालों तक वेंटिलेटर पर चली बस, अब टूटी सांस इस सरकारी पत्र ने एक बड़ा ही रोचक रहस्योद्घाटन भी किया है। पता चला है कि रायपुर नगर निगम ट्रांसपोर्ट लिमिटेड का अनुबंध तो दिसंबर 2022 में ही स्वर्ग सिधार चुका था। लेकिन कर्मचारियों के आवागमन की सुविधा को ध्यान में रखते हुए, नया रायपुर अटल नगर विकास प्राधिकरण के साथ ‘एम.ओ.यू.’ का जुगाड़ लगाकर किसी तरह एकल फेरा (सिंगल ट्रिप) की सांसें चलाई जा रही थीं। अब 31 अक्टूबर 2026 को इस एम.ओ.यू. की भी आयु समाप्त हो रही है, और इसके साथ ही सरकारी कृपा के पहिए थम जाएंगे।
(नोट: सरकारी पत्र में 2022 की तारीख को ‘19.012.2022’ लिखा गया है—शायद बस बंद होने के दुख में टाइपराइटर के भी आंसू निकल गए और एक शून्य अतिरिक्त दब गया!)
सत्ता के गलियारों में सबसे बड़ा ‘यक्ष प्रश्न’ इस आदेश के बाद से ही अटल नगर के सरकारी गलियारों में सन्नाटा और चाय की टपरियों पर उबाल है। अब सबके सामने एक ही यक्ष प्रश्न मुंह बाए खड़ा है: क्या सरकारी कर्मचारी भी अब आम नागरिक का दर्द महसूस करेंगे, या फिर सरकार से लड़कर अपनी मांग पूरी करवाएंगे?
- पहला विकल्प (आम नागरिक बनने का सुख): क्या अब हमारे सरकारी बाबू भी आम जनता की तरह सुबह-सुबह ऑटो वालों की मनमानी झेलेंगे? क्या वे भी पेट्रोल पंप पर मीटर की तरफ देखकर आहें भरेंगे और टूटी सड़कों के गड्ढों में अपनी ही गाड़ी के शॉक-एब्जॉर्बर तुड़वाकर आम आदमी की बेबसी को गहराई से महसूस करेंगे? जिस आम जनता को काउंटर पर खड़ा करके “कल आना” या “अभी सर्वर डाउन है” कहा जाता था, क्या अब बस न मिलने पर बाबू साहब खुद दफ्तर देर से पहुंचकर ‘सिस्टम’ का दर्द समझ पाएंगे?
- दूसरा विकल्प (संघर्ष और हड़ताल का पारंपरिक मार्ग): या फिर, सरकारी कर्मचारियों की पुरानी और गौरवशाली परंपरा जाग उठेगी? आम आदमी तो चुपचाप जेब ढीली कर लेता है, लेकिन सरकारी तंत्र में तो ‘कलमबंद हड़ताल’, ‘काली पट्टी’ और ‘धरना प्रदर्शन’ जैसे ब्रह्मास्त्र मौजूद हैं। क्या कर्मचारी यूनियन इस “अन्याय” के खिलाफ मोर्चा खोलकर सरकार को झुकाएगी और नवंबर में फिर से सरकारी बस में बैठकर ठंडी हवा खाएगी?
फिलहाल 31 अक्टूबर की तारीख नजदीक आ रही है। अब देखना यह है कि 1 नवंबर से सरकारी दफ्तर के बाहर गाड़ियों का मेला लगता है, या फिर मांगों को लेकर नारेबाजी का रेला!

