Jitiya Vrat 2026 : नई दिल्ली। हिंदू धर्म में जीवित्पुत्रिका व्रत का विशेष महत्व है। इसे जितिया या जिउतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को यह व्रत रखा जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि की कामना के साथ निर्जला उपवास करती हैं। यह व्रत मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। तीन दिनों तक चलने वाले इस पर्व में नहाय-खाय, निर्जला उपवास और पारण की विशेष परंपरा है।
कब रखा जाएगा जितिया व्रत 2026?
वर्ष 2026 में जितिया व्रत की सही तारीख और अष्टमी तिथि के प्रारंभ एवं समापन का समय स्थानीय पंचांग के अनुसार निर्धारित किया जाएगा। व्रत रखने वाली महिलाओं को उदया तिथि, अष्टमी तिथि और पारण के समय का ध्यान रखना चाहिए। अलग-अलग पंचांगों में तिथि की गणना के कारण पूजा के समय में अंतर हो सकता है।
तीन दिन तक चलता है जितिया व्रत, जानें नियम
जितिया व्रत तीन दिनों तक मनाया जाता है। वर्ष 2026 में इसकी प्रमुख तिथियां इस प्रकार हैं।
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2 अक्टूबर, शुक्रवार – नहाय-खाय: व्रत के पहले दिन महिलाएं स्नान कर सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं और व्रत की तैयारी करती हैं।
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3 अक्टूबर, शनिवार – निर्जला व्रत: अष्टमी तिथि पर महिलाएं संतान की लंबी उम्र और खुशहाली के लिए बिना अन्न-जल ग्रहण किए उपवास रखती हैं।
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4 अक्टूबर, रविवार – पारण: नवमी तिथि पर प्रचलित परंपरा और पंचांग के अनुसार पूजा-अर्चना के बाद व्रत का पारण किया जाता है।
जितिया व्रत की पूजा विधि
व्रत के दिन महिलाएं सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और व्रत का संकल्प लेती हैं। शाम को प्रदोष काल में भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है। पूजा में फूल, फल, दीप, धूप और पारंपरिक पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। इसके बाद महिलाएं जितिया व्रत की कथा सुनती हैं और संतान की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं। क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार पूजा की विधि में अंतर हो सकता है।
क्या है जितिया व्रत की पौराणिक कथा?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जितिया व्रत की कथा राजा जीमूतवाहन से जुड़ी है। कथा में बताया जाता है कि जीमूतवाहन ने नागवंश की रक्षा के लिए गरुड़ के सामने स्वयं को समर्पित करने का निर्णय लिया था। उनके इस त्याग और करुणा से प्रभावित होकर गरुड़ ने नागों की बलि लेने की परंपरा छोड़ दी। मान्यता है कि इसी कथा के माध्यम से संतान की रक्षा, दीर्घायु और कल्याण का संदेश मिलता है। व्रत के दौरान महिलाएं श्रद्धापूर्वक इस कथा का श्रवण करती हैं।

