NISAR Satellite: भारत और अमेरिका के संयुक्त मिशन NISAR सैटेलाइट को हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर, भूस्खलन, जमीन में बदलाव और प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी के लिए बेहद अहम माना गया है। करीब 1.3 अरब डॉलर की लागत वाले इस मिशन से नेपाल में आई भीषण बाढ़ और उससे जुड़ी घटनाओं को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं।
नेपाल की त्रासदी के बीच क्यों चर्चा में आया NISAR?
नेपाल के रसुवा जिले में अचानक आई भयावह बाढ़ से बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ। रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना ग्लेशियर टूटने और बर्फ, पानी, चट्टानों व मलबे के खिसकने जैसी प्रक्रियाओं से जुड़ी हो सकती है। ऐसे में सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि NISAR को इसी तरह के हिमालयी बदलावों का अध्ययन करने के लिए तैयार किया गया है।
NISAR में एडवांस्ड डुअल-फ्रीक्वेंसी रडार लगा है, जो पृथ्वी की सतह में बेहद छोटे बदलावों को माप सकता है। इसके जरिए ग्लेशियरों की निगरानी, भूस्खलन का अध्ययन, भूकंप से हुए बदलावों का आकलन और आपदा प्रबंधन में मदद मिलने की उम्मीद जताई गई थी।
क्या NISAR ने नेपाल में कोई संकेत नहीं पकड़े?
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि NISAR तकनीकी रूप से विफल रहा। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि ऐसा कोई सार्वजनिक सबूत नहीं है कि NISAR को हर बाढ़, भूस्खलन या ग्लेशियर टूटने की अलग-अलग भविष्यवाणी करने वाले ऑपरेशनल वॉर्निंग सैटेलाइट के रूप में डिजाइन किया गया था।
हालांकि, सवाल यह है कि नेपाल की इस बड़ी आपदा को लेकर NISAR से मिला कोई सार्वजनिक विश्लेषण, चेतावनी या विस्तृत वैज्ञानिक आकलन अब तक सामने क्यों नहीं आया। वैज्ञानिकों और आपदा विशेषज्ञों के बीच इसी बात को लेकर चर्चा हो रही है।
NISAR आखिर कैसे करता है काम?
NISAR यानी NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar, NASA और ISRO का संयुक्त पृथ्वी-अवलोकन मिशन है। इसका उद्देश्य टेक्टोनिक गतिविधियों, ग्लेशियरों, जंगलों, जमीन की सतह और अन्य प्राकृतिक बदलावों की हाई-रिजॉल्यूशन निगरानी करना है। मिशन से मिलने वाला डेटा आपदाओं और जलवायु परिवर्तन को समझने में वैज्ञानिकों की मदद कर सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, NISAR हर 12 दिन में दुनिया भर की जमीन और बर्फ से ढकी सतहों का अध्ययन करने के लिए बनाया गया है।
सबसे बड़ा सवाल: डेटा सार्वजनिक क्यों नहीं हुआ?
रिपोर्ट में बताया गया है कि इसरो और नासा की ओर से नेपाल की आपदा को लेकर NISAR से प्राप्त कोई जानकारी सार्वजनिक डोमेन में सामने नहीं आई है। वहीं, ISRO ने 17 अगस्त 2026 को कहा था कि NISAR पृथ्वी की गतिविधियों को समझने के लिए लगातार और व्यवस्थित तरीके से डेटा जुटा रहा है, जिसका इस्तेमाल आपदा प्रबंधन समेत कई वैज्ञानिक क्षेत्रों में किया जाएगा।
वैज्ञानिकों के अनुसार, सैटेलाइट मुख्य रूप से डेटा इकट्ठा करता है और उसका वैज्ञानिक विश्लेषण विशेषज्ञ करते हैं। इस तरह की घटनाओं से पहले के बदलावों को समझने के लिए पर्याप्त टाइम सीरीज और ऑटोमेटेड टूल्स विकसित करने में समय लगेगा।

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