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Sawan 2026 : इस प्राचीन शिव मंदिर से जुड़ी है अश्वत्थामा की रहस्यमयी कथा, मान्यता है आज भी करते हैं पूजा

Sawan 2026 : नई दिल्ली। सावन का पवित्र महीना शुरू होते ही देशभर के शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ने लगी है। भगवान शिव की आराधना और जलाभिषेक के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से मंदिरों का रुख कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के शिवराजपुर स्थित प्राचीन खेरेश्वर मंदिर में भी सावन के दौरान श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं।

इस मंदिर में कानपुर शहर के अलावा आसपास के गांवों और कस्बों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर बेहद प्राचीन है और इसका संबंध महाभारत काल तथा अश्वत्थामा से जोड़ा जाता है। मंदिर को लेकर कई ऐसी मान्यताएं प्रचलित हैं, जो इसे अन्य शिव मंदिरों से अलग बनाती हैं।

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महाभारत काल से जुड़ा है मंदिर का इतिहास

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, खेरेश्वर मंदिर में स्थापित शिवलिंग का संबंध द्वापर युग से माना जाता है। कहा जाता है कि गुरु द्रोणाचार्य और उनके पुत्र अश्वत्थामा यहां भगवान शिव की आराधना किया करते थे।

सबसे रहस्यमयी मान्यता यह है कि मंदिर के कपाट सुबह खुलने पर शिवलिंग पर जल और फूल चढ़े हुए मिलते हैं। स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, अश्वत्थामा आज भी यहां भगवान शिव की पूजा करने आते हैं।

हालांकि, यह एक धार्मिक मान्यता और स्थानीय आस्था से जुड़ी कथा है, जिसका कोई प्रत्यक्ष ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

अश्वत्थामा को क्यों मिला था श्राप?

महाभारत की कथा के अनुसार, अश्वत्थामा कौरवों की ओर से युद्ध लड़ रहे थे। युद्ध के अंतिम चरण में उन्होंने क्रोध में आकर पांडवों के शिविर में सो रहे द्रौपदी के पुत्रों की हत्या कर दी थी।

इस घटना के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया कि उन्हें अपने कर्मों का दंड भुगतते हुए लंबे समय तक पृथ्वी पर भटकना पड़ेगा। इसी वजह से धार्मिक कथाओं में अश्वत्थामा को चिरंजीवी माना जाता है।

कई लोक मान्यताओं में कहा जाता है कि अश्वत्थामा आज भी पृथ्वी पर विचरण करते हैं और भगवान शिव की आराधना करते हैं।

भगवान शिव के अंश माने जाते हैं अश्वत्थामा

धार्मिक कथाओं के अनुसार, गुरु द्रोणाचार्य और उनकी पत्नी कृपि ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। इसके बाद उन्हें अश्वत्थामा की प्राप्ति हुई। मान्यता है कि अश्वत्थामा में भगवान शिव का अंश था। इसी वजह से उन्हें शिव का परम भक्त भी माना जाता है।

खेरेश्वर मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार, अश्वत्थामा आज भी सबसे पहले भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। मंदिर के कपाट खुलने के बाद शिवलिंग पर जल और फूल चढ़े मिलने की बात स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच लंबे समय से चर्चा का विषय रही है।

सावन में बढ़ जाता है मंदिर का महत्व

खेरेश्वर मंदिर में पूरे वर्ष श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं, लेकिन सावन के महीने में यहां भक्तों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है।

श्रद्धालु भगवान शिव को जल, बेलपत्र और फूल अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। मंदिर से जुड़ी अश्वत्थामा की रहस्यमयी कथा भी भक्तों के आकर्षण का प्रमुख कारण है।

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