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The Origin of Lord Brahma

The Origin of Lord Brahma

The Origin of Lord Brahma : सृष्टि की शुरुआत का वो रहस्य, जब भगवान विष्णु की नाभि से निकले कमल पर प्रकट हुए जगत पिता ब्रह्मा

The Origin of Lord Brahma : नई दिल्ली। हिंदू धर्म में त्रिदेवों में सृष्टि के रचयिता माने जाने वाले भगवान ब्रह्मा का विशेष स्थान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मा जी ने ही संसार की रचना की और वेदों का ज्ञान ऋषियों एवं देवताओं को प्रदान किया। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ब्रह्मा जी की उत्पत्ति भगवान विष्णु की नाभि से निकले कमल से ही क्यों हुई? आइए जानते हैं इस रहस्य से जुड़ी पौराणिक कथा।

The Origin of Lord Brahma
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कैसे हुई ब्रह्मा जी की उत्पत्ति?

पुराणों के अनुसार, सृष्टि के आरंभ से पहले चारों ओर केवल अंधकार और जल ही था। उस समय भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में विराजमान थे। जब सृष्टि निर्माण का समय आया, तब उनकी नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। यह कमल असाधारण तेज और ऊर्जा से युक्त था।

इसी कमल के मध्य से भगवान ब्रह्मा प्रकट हुए। कमल से जन्म लेने के कारण उन्हें पद्मजा और कमलयोनि भी कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि यही कमल आगे चलकर सृष्टि की रचना का आधार बना।

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जन्म का रहस्य जानने निकले ब्रह्मा

जब ब्रह्मा जी ने अपनी आंखें खोलीं तो उन्हें चारों ओर केवल जल ही दिखाई दिया। उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि उनका जन्म कैसे हुआ और उनका उद्देश्य क्या है। अपने जन्म के स्रोत को खोजने के लिए वे कमल के डंठल के भीतर प्रवेश कर नीचे की ओर गए।

कई वर्षों तक खोज करने के बावजूद उन्हें अपने जन्मदाता का पता नहीं चला। अंततः वे वापस कमल पर लौट आए और ध्यान में बैठ गए।

तपस्या से प्रसन्न हुए भगवान विष्णु

कथा के अनुसार, ध्यान के दौरान ब्रह्मा जी को जल के भीतर से “तप” शब्द सुनाई दिया। इसके बाद उन्होंने हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिए और उनके जन्म का रहस्य बताया।

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भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को वेदों का दिव्य ज्ञान प्रदान किया और सृष्टि की रचना का दायित्व सौंपा। इसके बाद ब्रह्मा जी ने देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों और समस्त जीव-जगत की रचना का कार्य प्रारंभ किया।

श्रीमद्भागवत महापुराण में मिलता है वर्णन

भगवान विष्णु की नाभि से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति का विस्तृत वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के तृतीय स्कंध के आठवें अध्याय में मिलता है। यह कथा सृष्टि की शुरुआत और ब्रह्मा जी के दिव्य स्वरूप को समझने का महत्वपूर्ण आधार मानी जाती है।

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