नई दिल्ली। उर्दू अदब और आधुनिक ग़ज़ल के सबसे चमकदार सितारों में शुमार डॉ. बशीर बद्र ने 91 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके निधन की खबर से साहित्य जगत, शायरी प्रेमियों और देश-विदेश में फैले उनके लाखों चाहने वालों में शोक की लहर दौड़ गई है। Bashir Badr को उनकी सरल, रूमानी और दिल को छू लेने वाली ग़ज़लों के लिए हमेशा याद किया जाएगा। उन्होंने उर्दू शायरी को भारी-भरकम और मुश्किल शब्दों की दुनिया से निकालकर आम आदमी की बोलचाल का हिस्सा बना दिया। यही वजह रही कि उनकी ग़ज़लें सिर्फ मुशायरों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी और जज्बातों का हिस्सा बन गईं।
पद्मश्री से हुआ था सम्मानित
साहित्य और उर्दू शायरी में उनके ऐतिहासिक योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मश्री’ सम्मान से नवाजा था। उनकी रचनाओं में मोहब्बत, इंसानी रिश्ते, दर्द, तन्हाई और जिंदगी की गहरी सच्चाइयों का बेहद खूबसूरत चित्रण देखने को मिलता है। उनके मशहूर शेर आज भी लोगों की जुबान पर रहते हैं। उनकी लेखनी ने कई पीढ़ियों को प्रभावित किया और उर्दू ग़ज़ल को नई पहचान दिलाई।
डिमेंशिया से जूझ रहे थे बशीर बद्र
जीवन के अंतिम वर्षों में बशीर बद्र डिमेंशिया बीमारी से पीड़ित थे, जिसके कारण उनकी याददाश्त काफी कमजोर हो चुकी थी। बताया जाता है कि उनकी पत्नी उन्हें उनकी ही लिखी ग़ज़लें और शेर सुनाकर पुरानी यादों से जोड़ने की कोशिश करती थीं।उनकी निजी जिंदगी भी कई दर्दनाक घटनाओं से गुजरी। साल 1987 में मेरठ में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान उनका घर आग के हवाले कर दिया गया था। इस हादसे में उनकी कई अप्रकाशित रचनाएं और वर्षों की मेहनत राख में तब्दील हो गई थी।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से जुड़ा रहा लंबा सफर
15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में जन्मे बशीर बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) से उच्च शिक्षा और पीएचडी की डिग्री हासिल की थी। बाद में उन्होंने वहीं उर्दू के प्रोफेसर के रूप में भी लंबे समय तक सेवाएं दीं।मेरठ दंगों के बाद वे मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में बस गए थे और वहीं रहकर साहित्य साधना करते रहे।
शिमला समझौते में गूंजा था उनका शेर
बशीर बद्र की शायरी सिर्फ मोहब्बत तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने भारत-पाकिस्तान संबंधों और सामाजिक सरोकारों को भी नई आवाज दी। साल 1972 के ऐतिहासिक शिमला समझौते के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के स्वागत में उनका मशहूर शेर सुनाया था। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि उनकी शायरी में सिर्फ साहित्यिक खूबसूरती ही नहीं, बल्कि सामाजिक और कूटनीतिक प्रभाव भी था।
हमेशा जिंदा रहेंगी उनकी ग़ज़लें
भले ही बशीर बद्र आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी ग़ज़लें, शेर और अल्फाज हमेशा साहित्य प्रेमियों के दिलों में जिंदा रहेंगे। उर्दू अदब में उनका योगदान हमेशा सुनहरे अक्षरों में याद किया जाएगा।

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