काउंटिंग से पहले ही बढ़ी टेंशन
चुनाव आयोग के मुताबिक प्रक्रिया साफ है। सुबह 8 बजे पोस्टल बैलेट खुलेंगे। फिर ईवीएम। और करीब 9 बजे से रुझान स्क्रीन पर चमकने लगेंगे। लेकिन इस बार कहानी अलग है। मुंबई का सट्टा बाजार—जो हर बड़े चुनाव से पहले अपने “अनुमान” के लिए चर्चा में आता है—ने इस बार भी अपना गणित पेश किया है। यही गणित अब सियासी कैंपों में बेचैनी फैला रहा है। कमरे बंद हैं। फोन लगातार बज रहे हैं। नेताओं के चेहरे पढ़ना मुश्किल नहीं। कोई आत्मविश्वास दिखा रहा है, कोई चुप है। माहौल भारी है।
क्यों असर डालती है ये भविष्यवाणी?
सट्टा बाजार के आंकड़े आधिकारिक नहीं होते। फिर भी असर पड़ता है। क्यों? क्योंकि यह जमीन की हवा का दावा करता है।
- स्थानीय नेटवर्क से इनपुट लेने का दावा
- मतदाताओं के रुझान का “अनौपचारिक आकलन”
- राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा का बड़ा कारण
लेकिन सच्चाई साफ है—ये सिर्फ अनुमान है। न कोई डेटा सार्वजनिक, न कोई वैरिफाइड मेथड।
जमीन पर कैसा है माहौल?
काउंटिंग से पहले की रात अलग होती है। चाय के कप खत्म होते रहते हैं। टीवी स्क्रीन नहीं बंद होती। पार्टी दफ्तरों में कुर्सियां भरी रहती हैं, लेकिन बातचीत कम होती है। एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने धीरे से कहा, “अब कुछ भी कहो, असली फैसला कल मशीन बताएगी।”

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