जब परंपरा बदली, बारात दुल्हन के घर से निकली
आमतौर पर शादियों में दूल्हा बारात लेकर दुल्हन के घर जाता है। लेकिन सरगुजा में तस्वीर उलट गई। ढोल-नगाड़े बजे, गाड़ियां सजीं, और बारात निकली—लेकिन इस बार दुल्हन की ओर से। देवमुनि एक्का पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ दूल्हे के घर पहुंचीं। माहौल अलग था, लेकिन उत्साह कम नहीं। गांव के लोग सड़क किनारे खड़े होकर इस अनोखे नजारे को देखते रह गए।आपको महसूस होता कि यह सिर्फ शादी नहीं थी, बल्कि एक परंपरा को नए तरीके से जीने की कोशिश थी।
‘कन्यादान’ नहीं, ‘वरदान’ की रस्म
यह विवाह मसीही रीति-रिवाज के तहत संपन्न हुआ। यहां कन्यादान की जगह ‘वरदान’ की रस्म निभाई गई। यानी दूल्हे को प्रतीकात्मक रूप से स्वीकार किया गया। यह बदलाव सिर्फ रस्मों में नहीं था, सोच में भी था। दोनों परिवारों ने मिलकर इस शादी को सहमति और सम्मान के साथ आगे बढ़ाया।
सबसे भावुक पल: दूल्हे की विदाई
शादी खत्म हुई। अब बारी थी विदाई की। लेकिन इस बार दुल्हन नहीं, दूल्हा विदा हो रहा था। जैसे ही विदाई का वक्त आया, माहौल अचानक बदल गया। हंसी-खुशी के बीच एक भारी सन्नाटा। दूल्हा बिलासुस बरवा अपने परिवार से लिपटकर रो पड़ा। यह वही दृश्य था जो आमतौर पर दुल्हन के साथ देखा जाता है। लेकिन यहां रोल बदल चुके थे।
“हमने सोचा कुछ अलग करें, जो दोनों परिवारों के लिए यादगार रहे। ये फैसला मिलकर लिया गया था।”
— परिवार के सदस्य

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