“मैडम, बादाम खाइए”—जब दफ्तर में मच गया हड़कंप
शनिवार, 18 अप्रैल 2026 को जब तरुण साहू हाउसिंग बोर्ड के दफ्तर पहुँचे, तो उन्हें फिर वही पुराना जवाब मिला। अधिकारियों ने कहा कि उनकी फाइल ट्रेस नहीं हो पा रही है। इसके बाद तरुण ने जेब से बादाम का पैकेट निकाला और सब-रजिस्ट्रार (डिप्टी रजिस्ट्रार) पूनम बंजारे की मेज पर खाली कर दिया। दफ्तर में मौजूद कर्मचारी और अन्य लोग यह देख सन्न रह गए। तरुण ने साफ कहा कि उन्होंने एक साल पहले फ्लैट खरीदा था, लेकिन कागजों के अभाव में वे आज भी मालिक होने के हक से वंचित हैं। यह महज़ एक घटना नहीं, बल्कि सरकारी दफ्तरों में धूल फांक रही फाइलों और आम आदमी की बेबसी की कड़वी सच्चाई है।
वायरल वीडियो और प्रशासनिक सुस्ती पर प्रहार
इस पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल गया है। लोग तरुण के इस ‘स्मार्ट और ह्यूमरस’ विरोध की जमकर तारीफ कर रहे हैं। आप दफ्तर की हवा में उस तनाव को महसूस कर सकते हैं; एक तरफ एक परेशान नागरिक की हताशा और दूसरी तरफ व्यवस्था की चुप्पी। तरुण साहू ने अधिकारियों को याद दिलाया कि बादाम दिमाग और याददाश्त तेज करने के लिए जाने जाते हैं, और शायद इन्हें खाकर अधिकारी यह “याद” कर सकें कि आखिर उनकी फाइल अलमारी के किस कोने में दबी है।
“मैडम, ये बादाम खाइए, आपकी याददाश्त कमजोर हो गई है। एक साल हो गया मैं चक्कर लगा रहा हूँ और आप हर बार कहती हैं कि फाइल नहीं मिल रही। शायद इसे खाकर आपको याद आ जाए कि फाइल कहाँ है।”
इस घटना के बाद अब हाउसिंग बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारियों पर दबाव बढ़ गया है। सूत्रों के मुताबिक, विभाग ने आनन-फानन में फाइल की तलाश तेज कर दी है। यह मामला केवल एक फाइल का नहीं है; यह डिजिटल इंडिया के दौर में भी फाइलों के खो जाने और ‘मैनेजमेंट’ की विफलता पर बड़ा सवाल है। आने वाले दिनों में देखना होगा कि क्या बादाम का यह असर काम करता है या तरुण को न्याय के लिए और कड़े कदम उठाने पड़ेंगे। यह विरोध रणनीतिक और राजनीतिक रूप से प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।

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