जनगणना और परिसीमन: आरक्षण का असली फॉर्मूला
यह कोई छोटा-मोटा बदलाव नहीं है। यह भारत की लोकतांत्रिक संरचना का एक बड़ा पुनर्गठन है। इस पूरी योजना की बुनियाद आगामी जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन (delimitation) पर टिकी है। सूत्रों ने खुलासा किया है कि प्रस्तावित 850 सीटों में से, राज्यों के लिए एक बड़ा हिस्सा—815 सीटें—आरक्षित किया जाएगा। बाकी बची 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के खाते में जाएंगी। यह विस्तार अनिवार्य है क्योंकि महिला आरक्षण अधिनियम के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करना आवश्यक है।
सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने का मतलब है कि यह आरक्षण वर्तमान पुरुष सांसदों की सीटों में सेंध लगाए बिना लागू किया जा सकता है। यह एक चतुर राजनीतिक चाल है जो संभावित आंतरिक कलह को रोकती है, साथ ही यह सुनिश्चित करती है कि संसद में महिला प्रतिनिधित्व तेजी से बढ़े। कल्पना कीजिए, अगले परिसीमन के बाद, उत्तर प्रदेश या बिहार जैसे राज्यों में संसदीय क्षेत्रों की संख्या लगभग दोगुनी हो सकती है। आप अभी से राजनैतिक दलों के दफ्तरों में हलचल महसूस कर सकते हैं क्योंकि नेता अपने नए, छोटे और संभावित रूप से महिला-आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के लिए रणनीतियाँ बनाने में जुट गए हैं।
“यह सिर्फ सीटों का गणित नहीं है; यह आधी आबादी को उनका हक देने की दिशा में एक साहसिक कदम है। 850 सीटों वाली संसद भारत के नए, समावेशी लोकतंत्र का प्रतीक होगी।”
— एक वरिष्ठ सरकारी सूत्र
यह खबर सीधे तौर पर 2029 के महासंग्राम की नींव रखती है। 2026 के वर्तमान राजनैतिक माहौल में, यह स्पष्ट है कि सभी दल अब महिला कैडर को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करेंगे। संसद भवन का विस्तार, जो पहले से ही चर्चा में है, अब और भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि इसे 850 सांसदों को समायोजित करना होगा। परिसीमन प्रक्रिया निष्पक्ष रूप से कैसे होगी, यह एक बड़ा सवाल है और आने वाले वर्षों में बहस का एक प्रमुख विषय बना रहेगा। लेकिन एक बात निश्चित है: भारतीय संसद का चेहरा हमेशा के लिए बदलने वाला है।

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