सड़क बनी रणभूमि, धुआं और पत्थरों की बारिश
सुबह का वक्त था। लोग काम पर निकल रहे थे। तभी भीड़ जमा हुई। नारे गूंजे। फिर गुस्सा फूटा। कर्मचारियों ने सड़क जाम कर दी। कुछ ही देर में पत्थर चलने लगे। बसें और गाड़ियां निशाने पर आईं। आग की लपटें उठीं, काला धुआं आसमान में भर गया। मौके पर मौजूद लोगों में डर साफ दिखा। एक चश्मदीद ने बताया, “अचानक सब कुछ बदल गया। लोग भाग रहे थे, गाड़ियां जल रही थीं, और पुलिस पीछे हटती दिखी।”
पुलिस की जवाबी कार्रवाई, आंसू गैस के गोले
हालात बिगड़ते देख पुलिस ने मोर्चा संभाला। भीड़ को रोकने के लिए आंसू गैस के गोले दागे गए। कुछ जगह हल्का बल प्रयोग भी किया गया। इस दौरान एक पुलिस वाहन को भीड़ ने घेर लिया और पलट दिया। तनाव बढ़ता गया, लेकिन धीरे-धीरे पुलिस ने इलाके को खाली कराया।
“हम कई महीनों से सैलरी बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। गुस्सा अब बाहर आ गया है।” — प्रदर्शनकारी कर्मचारी
मामले की जड़ में वेतन वृद्धि की मांग है। कर्मचारियों का कहना है कि महंगाई बढ़ी, लेकिन सैलरी वहीं अटकी रही। बातचीत नहीं हुई। दबाव बढ़ा। और फिर ये विस्फोट। अब प्रशासन के सामने दो बड़ी चुनौती हैं—स्थिति को पूरी तरह नियंत्रण में रखना और बातचीत का रास्ता खोलना। अगर जल्द समाधान नहीं निकला, तो यह विरोध और फैल सकता है। इंडस्ट्रियल बेल्ट में इसका असर दिखना तय है।

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