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April 7, 2026

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Freedom of Religion law Implemented : छत्तीसगढ़ में ‘धर्मांतरण’ पर अब उम्रकैद का खौफ’ नया धर्म स्वातंत्र्य कानून आज से लागू, मददगार भी जाएंगे जेल

रायपुर | 07 अप्रैल 2026 छत्तीसगढ़ में अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए राज्य सरकार का सबसे बड़ा और कड़ा प्रहार शुरू हो गया है। राज्यपाल रमेन डेका के हस्ताक्षर के साथ ही प्रदेश में आज से ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य कानून 2026’ पूरी तरह प्रभावी हो गया है। इस नए कानून के तहत अब बलपूर्वक, प्रलोभन देकर या धोखाधड़ी से धर्म परिवर्तन कराना न केवल अपराध है, बल्कि इसके लिए बेहद कठोर दंड और भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

नए कानून के तहत ‘कठोर सजा’ के प्रावधान

राज्य सरकार ने इस कानून को इतना सख्त बनाया है कि अब दोषियों को समाज और कानून के सामने कड़ी जवाबदेही देनी होगी।

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  • जेल और जुर्माना: गलत जानकारी, लालच या दबाव में धर्मांतरण कराने पर दोषियों को 7 से 10 साल तक की जेल काटनी होगी।

  • भारी भरकम दंड: जेल के साथ ही कम से कम 5 लाख रुपये का जुर्माना भी देना होगा।

  • मददगारों पर भी गाज: यह कानून केवल धर्मांतरण कराने वालों पर ही नहीं, बल्कि इसमें सहायता करने वाले संस्थानों या व्यक्तियों (मददगारों) पर भी समान रूप से लागू होगा। उन्हें भी जेल की हवा खानी पड़ सकती है।

  • उम्रकैद तक की नौबत: कुछ विशेष परिस्थितियों और बार-बार अपराध दोहराने के मामलों में सजा की अवधि को बढ़ाकर उम्रकैद तक किए जाने का कड़ा प्रावधान शामिल है।

कलेक्टर को देनी होगी 60 दिन पहले सूचना

अब स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करना भी एक लंबी कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा होगा:

  1. अपनी मर्जी से धर्म बदलने वाले व्यक्ति को कम से कम 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट (कलेक्टर) को आवेदन देना होगा।

  2. धर्म परिवर्तन कराने वाले व्यक्ति (धर्माचार्य) को भी एक महीने पहले इसकी सूचना शासन को देनी होगी।

  3. प्रशासन स्तर पर जांच के बाद ही इसे वैध माना जाएगा। यदि नियमों का उल्लंघन हुआ, तो इसे ‘अवैध धर्मांतरण’ मानकर कार्यवाही की जाएगी।

क्यों पड़ी इस सख्त कानून की जरूरत?

छत्तीसगढ़ के बस्तर, सरगुजा और अन्य आदिवासी अंचलों से लगातार जबरन धर्मांतरण और प्रलोभन की शिकायतें सामने आ रही थीं। राज्य की विष्णुदेव साय सरकार ने इसे अपनी प्राथमिकता में रखा था। डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने पहले ही संकेत दिए थे कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान और भोले-भाले आदिवासियों के संरक्षण के लिए यह कानून अनिवार्य है।

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