हिंसा का महिमामंडन: फिल्ममेकर्स पर साधा निशाना
मुंबई में आयोजित एक पॉडकास्ट के दौरान अभिनेता ने कहा कि आजकल सिनेमा में “खून-खराबा और टॉक्सिक मर्दानगी” को वीरता के रूप में पेश किया जा रहा है। फिल्म ‘धुरंधर’ के ट्रेलर और ‘टॉक्सिक’ के टीजर का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि कला का उद्देश्य संवेदनाएं जगाना होना चाहिए, न कि नफरत या आक्रामकता। उन्होंने सीधा सवाल किया कि क्या आज के फिल्ममेकर्स के पास कहानी कहने के लिए हिंसा के अलावा कोई और जरिया नहीं बचा है?
- धुरंधर (Dhurandhar): इस फिल्म के एक्शन दृश्यों में हथियारों के भद्दे प्रदर्शन पर आपत्ति जताई गई।
- टॉक्सिक (Toxic): फिल्म के नाम और उसके पोस्टर में दिखाई गई डार्क थीम को “दिमागी रूप से अशांत” करने वाला बताया गया।
- सेंसर बोर्ड की भूमिका: अभिनेता ने सेंसर बोर्ड से ऐसी फिल्मों के लिए कड़े नियम बनाने की अपील की।
Voices from the Ground / Official Statements
“सिनेमा समाज का आईना है, लेकिन अगर हम केवल ‘हिंसक’ किरदारों को ही हीरो बनाकर पेश करेंगे, तो नई पीढ़ी को क्या संदेश दे रहे हैं? ‘धुरंधर’ और ‘टॉक्सिक’ जैसी फिल्मों में हिंसा को ‘कूल’ दिखाया जा रहा है, जो असल में हिंसक सोच को बढ़ावा दे रहा है। हमें कला और तबाही के बीच फर्क समझना होगा।” — हीरामंडी फेम एक्टर (इंटरव्यू के दौरान)
Impact on Residents / आगे क्या?
इस बयान ने सोशल मीडिया पर नेटिज़न्स को दो गुटों में बांट दिया है। जहां एक ओर ‘हीरामंडी’ के फैंस अभिनेता की संवेदनशीलता की तारीफ कर रहे हैं, वहीं ‘टॉक्सिक’ और ‘धुरंधर’ के फैंस इसे “पब्लिसिटी स्टंट” बता रहे हैं। फिल्म समीक्षकों का मानना है कि आने वाले दिनों में सेंसर बोर्ड (CBFC) पर इन फिल्मों के कुछ दृश्यों को काटने का दबाव बढ़ सकता है। फिल्ममेकर्स ने फिलहाल इस टिप्पणी पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन इंडस्ट्री के भीतर ‘कंटेंट की जिम्मेदारी’ को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है।

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