Mahashivratri 2026: नई दिल्ली। हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का पर्व केवल एक व्रत या त्योहार नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीक है। यह पर्व त्याग, अटूट विश्वास, तपस्या और युगों-युगों के इंतजार की उस पौराणिक कथा से जुड़ा है, जब देवों के देव महादेव ने माता पार्वती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था। वर्ष 2026 की महाशिवरात्रि पर श्रद्धालु इसी पावन कथा को स्मरण कर भोलेनाथ की आराधना करेंगे।
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सती का वियोग और शिव का वैराग्य
पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी सती अपने पिता दक्ष द्वारा भगवान शिव के अपमान को सहन नहीं कर सकीं और यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। सती के वियोग से व्यथित महादेव संसार से विरक्त हो गए और हिमालय में ध्यानस्थ होकर समाधि में लीन हो गए। शिव के बिना शक्ति अधूरी थी और शक्ति के बिना सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा।
पार्वती के रूप में पुनर्जन्म
देवी सती ने ही पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। बचपन से ही पार्वती भगवान शिव की परम भक्त थीं। समय के साथ उनका संकल्प और दृढ़ होता गया कि वे केवल महादेव से ही विवाह करेंगी। नारद मुनि ने उन्हें बताया कि शिव को पाने का एकमात्र मार्ग कठोर तपस्या है, क्योंकि समाधि में लीन भोलेनाथ केवल सच्ची भक्ति से ही जागृत होते हैं।
अपर्णा नाम का रहस्य
माता पार्वती ने सभी सांसारिक सुखों का त्याग कर हिमालय में कठोर तपस्या शुरू की। वर्षों तक उन्होंने केवल फल-फूल और जल पर जीवन व्यतीत किया। एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने पत्तों का सेवन तक छोड़ दिया, इसी कारण उन्हें ‘अपर्णा’ कहा गया। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ध्यान से उठे, लेकिन उन्होंने पार्वती की परीक्षा लेने का निश्चय किया।
परीक्षा और महामिलन
भगवान शिव ने ब्राह्मण का रूप धारण कर माता पार्वती के पास जाकर स्वयं अपनी निंदा की। उन्होंने कहा कि श्मशानवासी, औघड़ और सर्पधारी शिव उनके योग्य नहीं हैं। यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो उठीं और उन्होंने स्पष्ट कहा कि उनका प्रेम रूप या बाह्य आडंबर से नहीं, बल्कि शिव के आत्मस्वरूप से जुड़ा है। पार्वती की अटूट श्रद्धा देखकर भगवान शिव अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए और उनका प्रण स्वीकार कर लिया।
महाशिवरात्रि पर विवाह उत्सव
फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी के दिन भगवान शिव अनोखी बारात लेकर माता पार्वती के द्वार पहुंचे। इस बारात में देवता, गंधर्व, नंदी और भूत-प्रेत तक शामिल थे। इसी पावन तिथि को शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ, जिसे आज महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है।

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